India's First Hindi Travel Photography Blog: Home

कुछ पंक्तियां इस ब्लॉग के बारे में :

प्रिय पाठक,
हिन्दी के प्रथम ट्रेवल फ़ोटोग्राफ़ी ब्लॉग पर आपका स्वागत है.….
ऐसा नहीं है कि हिन्दी में अच्छे ब्लॉग लिखने वालों की कमी है। हिन्दी में लोग एक से एक बेहतरीन ब्लॉग्स लिख रहे हैं। पर एक चीज़ की कमी अक्सर खलती है। जहां ब्लॉग पर अच्छा कन्टेन्ट है वहां एक अच्छी क्वालिटी की तस्वीर नहीं मिलती और जिन ब्लॉग्स पर अच्छी तस्वीरें होती हैं वहां कन्टेन्ट उतना अच्छा नहीं होता। मैं साहित्यकार के अलावा एक ट्रेवल राइटर और फोटोग्राफर हूँ। मैंने अपने इस ब्लॉग के ज़रिये इस दूरी को पाटने का प्रयास किया है। मेरा यह ब्लॉग हिन्दी का प्रथम ट्रेवल फ़ोटोग्राफ़ी ब्लॉग है। जहाँ आपको मिलेगी भारत के कुछ अनछुए पहलुओं, अनदेखे स्थानों की सविस्तार जानकारी और उन स्थानों से जुड़ी कुछ बेहतरीन तस्वीरें।
उम्मीद है, आप को मेरा यह प्रयास पसंद आएगा। आपकी प्रतिक्रियाओं की मुझे प्रतीक्षा रहेगी।
आपके कमेन्ट मुझे इस ब्लॉग को और बेहतर बनाने की प्रेरणा देंगे।

मंगल मृदुल कामनाओं सहित
आपकी हमसफ़र आपकी दोस्त

डा० कायनात क़ाज़ी
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गुरुवार, 27 अगस्त 2015

दा ग्रेट हिमालय कॉलिंग....सातवां दिन ऐतिहासिक मुरलीधर का मंदिर, नग्गर, हिमाचल प्रदेश

दा ग्रेट हिमालय कॉलिंग....सातवां दिन
ऐतिहासिक मुरलीधर का मंदिर, नग्गर
The Great Himalayas Calling...Murlidhar Temple,Naggar, Himachal Pradesh
Day-07

Murlidhar tample naggar himachal
इस सीरीज़ की पिछली पोस्ट देखने के लिए यहां क्लिक करें: दा ग्रेट हिमालय कॉलिंग....पांचवां दिन, नग्गर

नग्गर हिमाचल का एक छोटा क़स्बा माना जा सकता है। यहां अनेक मंदिर हैं। नग्गर यहां बने दुर्ग नग्गर कैसल के लिए बहुत प्रसिद्ध है। जिसके बारे में आप मेरी पिछली पोस्ट  में पहले ही विस्तार से पढ़ चुके है। नग्गर को मंदिरों का नगर भी कहा जाता है, क्योंकि यही एक ऐसा गांव है, जहां स्थानीय शैली से लेकर मध्ययुगीन पहाड़ी शिखर शैली के मंदिर मिलेंगे। जब हम कैसल से बाहर नग्गर घूमने निकले तो हमें सबसे पहले कैसल केमुख्य द्वार के सामने मंदिर मिला, इसका नाम नार सिंह देवता मंदिर था । हम थोड़ा आगे बढे तो गांव के बीचो-बीच गौरीशंकर का पाषाण मंदिर मिला। इस प्रकार के तीन और मंदिर भी नग्गर में मिलेंगे। एक मंदिर देवी भटन्ती का है तो दूसरा ठाकुर ढावाहै। गांव में ही देवी त्रिपुर सुन्दरी का मंदिर है।

Tripura Sundri Temple



 यह मंदिर हिडिम्बा मंदिर के समान पैगोडा शैली का है। इस प्रकार के मंदिरों की तीन से चार छतें होती हैं, जो नीचे से ऊपर की ओर क्रमश: छोटी होती चलती है और सबसे ऊपर कलश होता है। त्रिपुरा सुन्दरी पौराणिक देवी होते हुए भी इसे स्थानीय देवी-देवताओं के समान मान्यता है। देवी का अपना रथ और एक सुचारु तंत्र है। यहां मई मास में नग्गर में षाढ़ी जाचनाम से एक बड़ा मेला लगता है जब आसपास के अनेक देवी-देवता सज-धज कर नग्गर आते हैं। इन मंदिरों के अलावा भी नग्गर में एक प्राचीन मंदिर है जिसका सम्बन्ध महाभारत काल से माना जाता है। यहां के लोग मानते हैं कि महाभारत के समय भगवान श्री कृष्ण यहां आए थे। इस मंदिर का नाम है-ऐतिहासिक मुरलीधर का मंदिर।

Murlidhar tample naggar himachal

यहां पहुंचने के लिए नग्गर कैसल से थोड़ा आगे जाकर ऊपर जंगल से होकर रास्ता बना हुआ है। 20-30 मिनिट की ट्रेक्किंग के बाद यहां पहुंचा जा सकता है। यह ट्रेकिंग आसान है। पाइन के ऊँचे-ऊँचे पेड़ों से ढका जंगल बहुत खूबसूरत लगता है। हमने बड़ी आसानी से इस चढ़ाई को लगभग तीस मिनट में पार कर लिया था. इस मंदिर तक पहुंचने के दो रास्ते हैं, एक पैदल का रास्ता है दूसरा घूमकर आता है। उस रास्ते से शायद कार भी आ सकती है। हम जब ऊपर अहुंचे तो हमने मंदिर के बाहर एक कार खड़ी देखी। जिसे देख मुझे बहुत हैरानी हुई। एक पहाड़ की छोटी तक यह कार कैसे पहुंची? मालूम करने पर पता चला कि एक और रास्ता भी है जिसके ज़रिये गाड़ी भी लाई जा सकती है।

Shikhare style architecture

हमने मंदिर के प्रांगण में एक रथ भी देखा, जिसका प्रयोग भगवान श्री कृष्ण की शोभा यात्रा के समय किया जाता है।इस मंदिर में भगवान श्री कृष्ण,राधा, पद्मसम्भव,लक्ष्मी नारायण और गरुण देवता की प्राचीन मूर्तियां स्थापित हैं। यहां हर वर्ष दशहरा बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है। इस मंदिर को कुल्लू के  राज घराने का आश्रय प्राप्त था। यहीं पर कुल्लू का प्रसिद्ध दशहरा मनाया जाता है। 

Temple Architecture

 मंदिर के पुरोहित जी ने हमारा स्वागत बड़ी आत्मीयता से किया। उन्होंने ही बताया कि इस मंदिर का निर्माण महाभारत काल में हुआ था। और इस मंदिर की बड़ी मान्यता है। यहां जो भी मन्नत मांगों वह ज़रूर पूरी होती है। लोग दूर-दूर से यहां मन्नत मांगने आते हैं। इस मंदिर की वास्तुकला देखने लायक है। आप जब नग्गर आएं तब यहां ज़रूर जाएं।

A very rear idol of 3 faces Lord Bramha at Murlidhar tample naggar himachal


Purohit ji at Murlidhar tample naggar himachal

इस सीरीज़ की अगली पोस्ट देखने के लिए यहां क्लिक करें:


फिर मिलेंगे दोस्तों, अगले पड़ाव में हिमालय के कुछ अनछुए पहलुओं के साथ,

तब तक खुश रहिये, और घूमते रहिये,

आपकी हमसफ़र आपकी दोस्त


डा० कायनात क़ाज़ी

बुधवार, 22 जुलाई 2015

जोधपुर का मंडोर गार्डन एक ट्रैवलर को ज़रूर देखना चाहिए



वर्षों से जोधपुर राजपुताना वैभव का केन्द्र रहा है। जिसके प्रमाण आज भी जोधपुर शहर से लगे अनेक स्थानों पर प्राचीन इमारतों के रूप में मिल जाते हैं। जोधपुर से 9 किलोमीटर की दूरी पर एक ऐतिहासिक स्थान मौजूद है जिसको मंडोर गार्डन के नाम से पुकारा जाता है। इसी के नाम पर एक ट्रैन का नाम भी रखा गया है-मंडोर एक्सप्रेस जोकि दिल्ली से जोधपुर के लिए चलती है। मैंने भी जोधपुर पहुंचने के लिए इसी ट्रेन का रिजर्वेशन करवाया था। यह ट्रैन शाम को पुरानी दिल्ली से चलती है और सुबह सात बजे जोधपुर पहुंचा देती है।



मण्डोर का प्राचीन नाम माण्डवपुरथा। जोधपुर से पहले मंडोर ही जोधपुर रियासत की राजधानी हुआ करता था। राव जोधा ने मंडोर को असुरक्षित मानकर सुरक्षा के लिहाज से चिड़िया कूट पर्वत पर मेहरानगढ़ फोर्ट का निर्माण कर अपने नाम से जोधपुर को बसाया था तथा इसे मारवाड़ की राजधानी बनाया। वर्तमान में मंडोर दुर्ग के भग्नावशेष ही बाकी हैं, जो बौद्ध स्थापत्य शैली के आधार पर बने हैं। इस दुर्ग में बड़े-बड़े प्रस्तरों को बिना किसी मसाले की सहायता से जोड़ा गया था।



मैंने अपने होटल के मैनेजर से यहां से जुड़ी कुछ जानकारियां जुटाईं। जोधपुर के आसपास ही कई देखने लायक ऐतिहासिक स्थल हैं जिसमे मंडोर अपनी स्थापत्य कला के कारण दूर-दूर तक मशहूर है। मंडोर गार्डन जोधपुर शहर से पांच मील दूर उत्तर दिशा में पथरीली चट्टानों पर थोड़े ऊंचे स्थान पर बना है।

ऐसा कहा जाता है कि मंडोर परिहार राजाओं का गढ़ था। सैकड़ों सालों तक यहां से परिहार राजाओं ने सम्पूर्ण मारवाड़ पर अपना राज किया। चुंडाजी राठौर की शादी परिहार राजकुमारी से होने पर मंडोर उन्हें दहेज में मिला तब से परिहार राजाओं की इस प्राचीन राजधानी पर राठौर शासकों का राज हो गया। मन्डोर मारवाड की पुरानी राजधानी रही है|



यहां के स्थानीय लोग यह भी मानते हैं कि मन्डोर रावण की ससुराल था। शायद रावण की पटरानी का नाम मन्दोद्री होने के कारण से ही इस जगह का नाम मंडोर पड़ा. यह बात यहां एक दंत कथा की तरह प्रचलित है। लेकिन इस बात का कोई ठोस प्रमाण मौजूद नहीं है।
मण्डोर स्थित दुर्ग देवल, देवताओं की राल, जनाना, उद्धान, संग्रहालय, महल तथा अजीत पोल दर्शनीय स्थल हैं।



मंडोर गार्डन एक विशाल उद्धान है। जिसे सुंदरता प्रदान करने के लिए कृत्रिम नहरों से सजाया गया है। जिसमें 'अजीत पोल', 'देवताओं की साल' 'वीरों का दालान', मंदिर, बावड़ी, 'जनाना महल', 'एक थम्बा महल', नहर, झील व जोधपुर के विभिन्न महाराजाओं के समाधि स्मारक बने है.  लाल पत्थर की बनी यह विशाल इमारतें स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूने हैं। इस उद्धान  में देशी-विदेशी पर्यटको की भीड़ लगी रहती है। यह गार्डन पर्यटकों के लिए सुबह आठ से शाम आठ बजे तक खुला रहता है।



जोधपुर और आसपास के स्थान घूमने का सबसे अच्छा साधन है यहां चलने वाले टेम्पो। आप थोड़ी बार्गेनिंग करके पूरे दिन के लिए टेम्पो वाले को घुमाने के लिए तय कर सकते हैं। मैंने भी टेम्पो को पूरे दिन के लिए तय कर लिया। मैं टेम्पो में बैठ कर मंडोर गार्डन पहुंची। यहां काफी लोग आते हैं। आप खाने पीने का सामान गार्डन के गेट से खरीद कर अंदर ले जा सकते हैं। पर थोड़ी सावधानी ज़रूरी है। यहां पर बड़े-बड़े लंगूर रहते हैं जोकि खाना छीन कर भाग जाते हैं। इस जगह को देखने से पहले यहां के इतिहास के बारे में थोड़ी जानकारी ज़रूरी है। यहां का इतिहास जो थोड़ा बहुत  मुझे यहां के लोगों से पता चला है। मैं आपके साथ साझा करती हूं।



मंडोर गार्डन का इतिहास
उद्धान में बनी कलात्मक भवनों का निर्माण जोधपुर के महाराजा अजीत सिंह व उनके पुत्र महाराजा अभय सिंह के शासन काल के समय सन् 1714 से 1749 ई. के बीच हुआ था। उसके पश्चात् जोधपुर के विभिन्न राजाओं ने इस उद्धान की मरम्मत आदि करवाई और समय समय पर इसे आधुनिक ढंग से सजाया और इसका विस्तार किया। आजकल यह सरकारी अवहेलना और भ्रष्टाचार की मार झेल रहा है। इस स्थान के रख रखाव पर ध्यान दिया जाना बहुत ज़रूरी है। रखरखाव की कमी से पानी की नहर कचरे से भर चुकी है। जिसे देख कर मुझे काफी अफ़सोस हुआ।

The Ek Thamba Mahal At Mandore Garden.


यह स्मारक पूरे राजस्थान में पाई जाने वाली राजपूत राजाओं की समाधि स्थलों से थोड़ा अलग हैं। जहां अन्य जगहों पर समाधि के रूप में विशाल छतरियों का निर्माण करवाया जाता रहा है। वहीँ जोधपुर के राजपूत राजाओं ने इन समाधि स्थलों को छतरी के आकर में न बनाकर ऊंचे चबूतरों पर विशाल मंदिर के आकर में बनवाया।
मंडोर उद्धान के मध्य भाग में दक्षिण से उत्तर की ओर एक ही पंक्ति में जोधपुर के महाराजाओं के समाधि स्मारक ऊंची पत्थर की कुर्सियों पर बने हैं, जिनकी स्थापत्य कला में हिन्दू स्थापत्य कला के साथ मुस्लिम स्थापत्य कला का उत्कृष्ट समन्वय देखा जा सकता है। जहां एक ओर राजाओं की समाधि  स्थल ऊंचे पत्थरों पर मंदिर के आकार के बने हुए हैं वहीं रानियों के समाधि स्थल छतरियों के आकर के बने हुए हैं। यहां पत्थरों पर की हुई नक्कारशी देखने लायक है। यहां मूर्तिकला के उत्कृष्ट नमूने देखने को मिलते हैं। यह समाधि स्थल बाहर से जितने विशाल हैं अंदर से भी उतने ही सजाए गए हैं। गहरे ऊंचे नक्कार्शीदार गुम्बद, पत्थरों पर उकेरी हुई मूर्तियों वाले खम्बे और दीवारें उस समय के लोगों की कला प्रेमी होने का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं।



 इनमें महाराजा अजीत सिंह का स्मारक सबसे विशाल है। यह उद्धान रोक्स पर बनाया गया था। उसके बावजूद यहां पर पर्याप्त हरयाली नज़र आती है। लाल पत्थरों की एकरूपता को खत्म करने के लिए यहां हरयाली का विशेष ध्यान रखा गया था जिसके लिए उद्धान के बीचों बीच से नहर निकाली गई थी। स्मारकों के पास ही एक फव्वारों से सुसज्जित नहर के अवशेष हैं, इन्हें देख कर लगता है कि कभी यह नहर नागादडी झील से शुरू होकर उद्धान के मुख्य दरवाजे तक आती होगी तो कितनी सुन्दर और कितनी सजीली दिखती होगी। नागादडी झील का निर्माण कार्य मंडोर के नागवंशियों ने कराया था, जिस पर महाराजा अजीत सिंह व महाराजा अभय सिंह के शासन काल में बांध का निर्माण कराया गया था।



यहां एक हॉल ऑफ हीरों भी है। जहां चट्टान पर उकेर कर दीवार में तराशी हुई आकृतियां हैं जो हिन्दु देवी-देवतीओं का प्रतिनिधित्व करती है। अपने ऊंची चट्टानी चबूतरों के साथ, अपने आकर्षक बगीचों के कारण यह प्रचलित पिकनिक स्थल बन गया है।



मैंने  उधान में घूमते घूमते अजीत पोल, 'देवताओं की साल', 'वीरों का दालान', मंदिर, बावड़ी, 'जनाना महल', 'एक थम्बा महल', नहर, झील व जोधपुर के विभिन्न महाराजाओं के स्मारक देखे। मंडोर गार्डन को तसल्ली से देखने के लिए कमसे कम आधा दिन तो लग ही जाता है। इसलिए यहां के लिए समय निकाल कर आएं। क्यूंकि यहां चलना अधिक पड़ता है इसलिए आरामदेह जूते पहन कर आएं और तेज़ धूप से बचने के लिए स्कार्फ या छतरी साथ लाएं।



जोधपुर कैसे पहुँचें?
जोधपुर शहर का अपने हवाई अड्डा और रेलवे स्टेशन हैं जो प्रमुख भारतीय शहरों से अच्छी तरह से जुड़े हैं। नई दिल्ली का इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा निकटतम अंतरराष्ट्रीय एयरबेस है। पर्यटक जयपुर, दिल्ली, जैसलमेर, बीकानेर, आगरा, अहमदाबाद, अजमेर, उदयपुर, और आगरा से बसों द्वारा भी यहां तक पहुंच सकते हैं।

कब जाएं?
इस क्षेत्र में वर्ष भर एक गर्म और शुष्क जलवायु बनी रहती है। ग्रीष्मकाल, मानसून और सर्दियां यहां के प्रमुख मौसम हैं। जोधपुर की यात्रा का सबसे अच्छा समय अक्टूबर के महीने से शुरू होकर और फरवरी तक रहता है।

कहां ठहरें ?
मंडोर से जोधपुर 8 किलोमीटर दूर है। इसलिए ठहरने के लिए जोधपुर एक अच्छा विकल्प है। जोधपुर में ठहरने के हर बजट के होटल हैं। अगर आप राजस्थानी संस्कृति और ब्लू सिटी का फील लेने जोधपुर जा रहे हैं तो ओल्ड सिटी में ही रुकें। यह स्टेशन से ज़्यादा दूर नहीं है। विदेशों से आए सैलानी यहां ओल्ड ब्लू सिटी में बड़े चाव से रुकते हैं। ब्लू सिटी मेहरानगढ़ फोर्ट के दामन  में बसा पुराना शहर है। जहां कई होटल और होम स्टे मिल जाते हैं। पर यहां ठहरने के लिए पहले से बुकिंग करवालें क्यूंकि विदेशियों में ब्लू सिटी का अत्यधिक क्रेज़ होने के कारण यह वर्ष भर भरे रहते हैं।

कितने दिन के लिए जाएं?
जोधपुर और उसके आसपास के स्थान सुकून से देखने के लिए कमसे कम 3-4 दिन का समय रखें।



फिर मिलेंगे दोस्तों, अगले पड़ाव में राजस्थान के कुछ अनछुए पहलुओं के साथ,

तब तक खुश रहिये, और घूमते रहिये,

आपकी हमसफ़र आपकी दोस्त




डा० कायनात क़ाज़ी




गुरुवार, 18 जून 2015

दा ग्रेट हिमालय कॉलिंग....छठा दिन

The great Himalayas calling...
DAY-6-Naggar



छठा  दिन-नग्गर

हिमालय की समृद्ध संस्कृति के दर्शन करने के लिए नग्गर से बेहतर जगह कोई हो  ही नहीं सकती है.इस नगर को राजा विशुद्ध पाल ने बसाया था और यह नगर 400 वर्षों तक कुल्लू की राजधानी रहा है। नग्गर को मंदिरों का नगर  भी कहा जाता है, क्योंकि यही एक ऐसा गांव है, जहां स्थानीय  शैली से लेकर मध्ययुगीन पहाड़ी शिखर शैली के मंदिर मिलेंगे।जब हम कैसल से बहार नग्गर घूमने निकले तो हमें सबसे पहले  कैसल के मुख्य द्वार के सामने  मंदिर मिला, इसका नाम नार सिंह देवता मंदिर था ।हम थोड़ा आगे बढे तो गांव के बीचो-बीच गौरीशंकर का पाषाण मंदिर मिला। इस प्रकार के तीन और मंदिर भी नग्गर में मिलेंगे। एक मंदिर देवी भटन्ती का है तो दूसरा ‘ठाकुर ढावा’ है। गांव में ही देवी त्रिपुर सुन्दरी का मंदिर है। यह मंदिर हिडिम्बा मंदिर के समान पैगोडा शैली का है। इस प्रकार के मंदिरों की तीन से चार छतें होती हैं, जो नीचे से ऊपर की ओर क्रमश: छोटी होती चलती है और सबसे ऊपर कलश होता है। त्रिपुर सुन्दरी पौराणिक देवी होते हुए भी इसे स्थानीय देवी-देवताओं के समान मान्यता है। देवी का अपना रथ और एक सुचारु तंत्र है। यहां मई मास में नग्गर में ‘षाढ़ी जाच’ नाम से एक बड़ा मेला लगता है जब आसपास के अनेक देवी-देवता सज-धज कर नग्गर आते हैं। 



 इस नगर में एक तरफ विश्व धरोहर नग्गर कैसल है तो दूसरी और रुसी चित्रकार निकलाय रौरिक की जागीर है। वह वर्षों पहले रूस से यहाँ आए और इस जगह की सुंदरता में ऐसे खोए कि यहीं बसने  का इरादा कर लिया। और यहाँ के राजा से एक जागीर भी खरीद ली। निकलाय रौरिक हिमालय के प्रेम में ऐसे गिरफ्त हुए कि उनकी सभी पेंटिंग्स हिमालय से जुड़ गईं नग्गर कैसल से लगभग तीन किलो मीटर की दूरी पर यह एस्टेट  मौजूद है। आज यहाँ निकलाय रौरिक के परिवार का कोई नहीं रहता है। इस जगह को संग्रहालय के रूप में बना दिया गया है। इस संग्रहालय में निकलाय रौरिक की सभी 37 पेंटिंग और उनके पुत्र स्वितास्लाव रौरिक की 12 पेंटिग संग्रहालय में सुरक्षित रखी हुई हैं। दार्शनिक, विचारक और चित्रकार रौरिक यहां 1927 में आए। यह पेंटिंग्स हिमालय में ही पाए जाने वाले प्राकृतिक रंगों से बनी हुई हैं.

Nicholas Roerich Art Gallery and Museum: 


मज़ेदार बात यह है कि निकलाय रौरिक के पुत्र स्वितास्लाव रौरिक ने अपने ज़माने की मशहूर फिल्म अभिनेत्री देविका रानी के साथ विवाह किया था। देविका रानी उस ज़माने की सुपर स्टार थीं पर खूबसूरत रुसी चित्रकार के प्रेम में पड़कर उन्होंने अपने करियर को सफलता के चरम शिखर पर छोड़ दिया था और यहाँ नग्गर में आकर बस गईं थीं।नग्गर है ही ऐसी जगह जहाँ बस जाने को जी करता है। आज निकलाय रौरिक का घर एक संग्रहालय बना हुआ है जिसे ऊपर की पहली मंज़िल के बरामदे में से खिड़कियों में से झांक कर देखा जा सकता है। यहाँ खिड़की से झांकते हुए मैंने देविका रानी की स्टडी देखी जिसकी खिड़की पर दो गुड़ियाँ रखी हुई थीं और सामने दिवार पर हाथ से बनाई हुई देविका रानी की पोर्ट्रेट मुस्कुरा रही थी। हर चीज़ थी अपनी जगह ठिकाने पर बस वही नहीं थे जिनका यह घर था। ऐसा लग रहा था जैसे अभी आते ही होंगे। मेज़ पर रखे गुलदस्ते में महकता ताज़ा फूल इस घर में लोगों के होने का भ्रम पैदा कर रहा था।


Naggar Valley view from Nicholas Roerich Art Gallery and Museum: 


रौरिक के चित्रों को देखकर ऐसा लगता है कि मानो उन्होंने हिमालय को अपने मन मस्तिष्क में आत्मसात  कर लिया हो। कला साधकों, समीक्षकों व शोधकर्ताओं के लिये तो यह तीर्थ स्थान है। यहीं पास में रौरिक की समाधि है।

नग्गर प्राकृतिक दृश्यावलियों के बीच एक रमणीक स्थल है। गांव तीन ओर घने देवदार के पेड़ों से घिरा है।इन्ही देवदारों के घने पेड़ों के बीच से होकर ऊपर महाभारत के समय का कृष्ण मंदिर है।  सामने सीढ़ीदार खेत, सेब के बागीचे और से घाटी का सुन्दर दृश्य। यह स्थान ब्यास के बायें तट पर है। नग्गर के राजा ने यहाँ कैसल इसी लिए बनवाया था कि इस कैसल की प्राचीर से वह पूरी कुल्लू वैली  को देख सके। 

Kullu Valley from Naggar Castle
इस अदभुत नगर में घूमते हुए आपको कई बेहतरीन कैफ़े मिल जाएंगे। जहाँ बैठ  कर आप गरमा गरम कॉफी और शानदार चीज़ केक का मज़ा ले सकते हैं। इन सभी जगहों पर अंग्रेज़ों का प्रभाव रहने की वजह से यहाँ बेकरी आइटम्स और कैफ़े भारी  मात्रा  में मिलते हैं। 
नग्गर में मेरा यह प्रवास बेहद शानदार रहा है। अगली पोस्ट में आपको ले चलूंगी। महाभारत काल के एक मंदिर के दर्शन पर। यहीं नग्गर से थोड़ा ऊपर जंगल में जाकर देखना होगा। 
फिर मिलेंगे दोस्तों, अगले पड़ाव में हिमालय के कुछ अनछुए पहलुओं के साथ,

तब तक खुश रहिये, और घूमते रहिये,

आपकी हमसफ़र आपकी दोस्त




डा० कायनात क़ाज़ी


और पढ़ें: http://hindi.sputniknews.com/hindi.ruvr.ru/2012_06_25/roerich-naggar-chitr/