India's First Hindi Travel Photography Blog: Home

कुछ पंक्तियां इस ब्लॉग के बारे में :

प्रिय पाठक,
हिन्दी के प्रथम ट्रेवल फ़ोटोग्राफ़ी ब्लॉग पर आपका स्वागत है.….
ऐसा नहीं है कि हिन्दी में अच्छे ब्लॉग लिखने वालों की कमी है। हिन्दी में लोग एक से एक बेहतरीन ब्लॉग्स लिख रहे हैं। पर एक चीज़ की कमी अक्सर खलती है। जहां ब्लॉग पर अच्छा कन्टेन्ट है वहां एक अच्छी क्वालिटी की तस्वीर नहीं मिलती और जिन ब्लॉग्स पर अच्छी तस्वीरें होती हैं वहां कन्टेन्ट उतना अच्छा नहीं होता। मैं साहित्यकार के अलावा एक ट्रेवल राइटर और फोटोग्राफर हूँ। मैंने अपने इस ब्लॉग के ज़रिये इस दूरी को पाटने का प्रयास किया है। मेरा यह ब्लॉग हिन्दी का प्रथम ट्रेवल फ़ोटोग्राफ़ी ब्लॉग है। जहाँ आपको मिलेगी भारत के कुछ अनछुए पहलुओं, अनदेखे स्थानों की सविस्तार जानकारी और उन स्थानों से जुड़ी कुछ बेहतरीन तस्वीरें।
उम्मीद है, आप को मेरा यह प्रयास पसंद आएगा। आपकी प्रतिक्रियाओं की मुझे प्रतीक्षा रहेगी।
आपके कमेन्ट मुझे इस ब्लॉग को और बेहतर बनाने की प्रेरणा देंगे।

मंगल मृदुल कामनाओं सहित
आपकी हमसफ़र आपकी दोस्त

डा० कायनात क़ाज़ी
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बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

एक सुहाना सफर एप्पल वैली के बीच से

एक सुहाना सफर एप्पल वैली के बीच से 



कश्मीर की एक ख़ासियत है। आप श्रीनगर से किसी भी दिशा में निकल जाएं कुदरत के हसीन नज़ारे बाहें फैलाए आपका स्वागत करेंगे। जो भी लोग कश्मीर घूमने आते हैं वह श्रीनगर के बाद पहलगाम देखने भी ज़रूर जाते हैं। पहलगाम अनंतनाग ज़िले में पड़ता है। यह स्थान समुद्र तल से 72,000 फिट की ऊंचाई पर बसा है। श्रीनगर से पहलगाम जाने के दो रास्ते हैं। एक रास्ता (National Highway-1A) झेलम नदी के किनारे किनारे चलता है और पम्पोर में केसर के खेतों के बीच  से होता हुआ अवन्तिपुरा के खंडहरों के पास से होकर पहलगाम जाता है । दूसरा रास्ता काकपोरा होते हुए जाता है। मेरी सलाह यह है कि आप जाते हुए पम्पोर वाले रास्ते से जाएं और वापसी में मटटन होते हुए श्रीनगर आएं। ऐसा करने से आप जाते हुए अवन्तिपुरा और एप्पल वैली देख पाएंगे और लौटे हुए मटटन का मार्तण्ड़ सूर्य मन्दिर भी देख सकेंगे। श्रीनगर और पहलगाम के बीच भी कई सारे ऐसे स्थान हैं जिन्हे कुछ देर ठहर कर देखा जा सकता है। आप कोशिश करें कि श्रीनगर से सुबह जल्दी निकलें। वरना आपका काफी समय ट्रैफिक में निकल जाएगा। 



श्रीनगर की भीड़ भाड़ से निकल कर जैसे ही आप अनंतनाग की ओर बढ़ेंगे आपको दूर दूर तक फैले ढ़ालदार खेत नज़र आएंगे। अगर आप फ़रवरी के माह में जाएंगे तो इन खेतों में केसर के सजीले जमुनी फूल दिखेंगे, और साथ ही दिखेंगे खेतों में काम करते हुए कश्मीरी किसानों के परिवार। लेकिन आप अगर गर्मी के मौसम में जा रहे हैं तो यहां सिर्फ खेत ही नज़र आएंगे। 
हम धीरे धीरे आगे बढ़ते हैं. पाइन के ऊँचे ऊँचे पेड़ों से हवा के झोंके भीनी भीनी खुशबू लेकर आते हैं। लगभग तीस किलोमीटर की दूरी पर अवन्तिपुरा मंदिर के अवशेष पड़ते हैं। इस मंदिर का निर्माण राजा अवन्ति वर्मन ने सन् 855 से 883 ईस्वीं में करवाया था। राजा अवन्ति वर्मन का सम्बन्ध उत्पला राजवंश से था। 


यह एक विशाल शिव मंदिर है। लेकिन अब यह सिर्फ अवशेष रूप में ही बचा है। पुरातत्व विभाग ने यहाँ बने एक छोटे से पार्क का रखरखाव का ज़िम्मा लिया हुआ है। इस स्थान को देखने के लिए आपको 5 रूपए का टिकट भी लेना होगा। 
यहां से थोड़ा आगे जाने पर हम National Highway-1A छोड़ देंगे और एप्पल वैली की और मुड़ जाएंगे। यहां से शुरू होती है कश्मीर की कंट्री साईट। खेत खलिहानो में लहलहाते धान के पौधे और लकड़ी के बने घर।  यहां थोड़ा आगे जाने पर झींगुर की आवाज़ें सन्नाटे को तोड़ती हैं। यह आवाज़ें पहचान है अखरोट और एप्पल के बाग़ों की। 


यहाँ सड़क के दोनों और सेब के बाग़ हैं। यह पूरा क्षेत्र सेब की खेती के लिए जाना जाता है। आप गाड़ी रोक कर इन बाग़ों में जा भी सकते हैं। लेकिन सेब तोड़ नहीं सकते। इसके लिए जुर्माना भरना पड़ेगा। सेबों से लधे हुए पेड़ देखने में बहुत सुन्दर दीखते हैं। आप चाहें तो घर लेजाने के लिए यहां से सेब खरीद भी सकते हैं। 


हमने काफी समय यहाँ बिताया और फिर पहलगाम के लिए आगे बढ़ गए। सड़क के चारों ओर अखरोट के पेड़ किसी मुस्तैद प्रहरी की तरह खड़े थे। हम एक के बाद एक गांव लांघते हुए पहलगाम की ओर बढ़ रहे थे। जहां अवन्तीपुरा तक झेलम नदी हमारे साथ साथ चल रही थी वहीँ पहलगाम पहुँचने पर लिद्दर नदी ने हमारा स्वागत किया। 


फिर मिलेंगे दोस्तों, भारत दर्शन में हिमालय के किसी नए रंग के साथ,


तब तक खुश रहिये,और घूमते रहिये,

एक शेर मेरे जैसे घुमक्कड़ों को समर्पित

 "सैर कर दुनियाँ की ग़ाफ़िल ज़िन्दिगानी फिर कहाँ,
ज़िन्दिगानी गर रही तो नौजवानी फिर कहाँ"

आपकी हमसफ़र आपकी दोस्त

 डा० कायनात क़ाज़ी

गुरुवार, 7 जनवरी 2016

सुहाना सफर:दार्जिलिंग हिमालयी रेल

सुहाना सफर:दार्जिलिंग हिमालयी रेल

Steam engine@Darjeeling Himalayan Railway


हमारे देश का गौरव माना जाने वाला हिमालय भारत के मानचित्र पर उत्तर से लेकर उत्तर पूर्व तक के अपने विशाल फैलाव में इतना कुछ समेटे हुए है कि जिसे गहराई से जानने और समझने के लिए शायद एक जन्म भी कम पड़ेगा। हिमालय से मेरा लगाव बार-बार मुझे अपनी ओर खींचता है। फिर वो शिवालिक हो, धौलाधार हो, या फिर पीरपंजाल सब को फलांगती मैं हिमालय की विविधता में और गहरे उतरती जाती हूं। इस बार दोस्तों हम उत्तर पूर्व में फैले हिमालय के कुछ बेहतरीन नज़रों से रूबरू होंगे। तो फिर चलें पूरब में बसे हिमालय का गेट कहे जाने वाले शहर न्यू जलपाईगुड़ी यहीं से हमारे सफर की शुरुवात होगी। हम यहीं से अतीत की यादों को ताज़ा करेंगे और लेंगे मज़ा दार्जिलिंग हिमालयी रेल यात्रा का।

Steam Engine ready to take the tourist for Joy ride 


 दार्जिलिंग हिमालयी रेल जिसे लोग "टॉय ट्रेन" के नाम से ज़्यादा पहचानते है, भारत के राज्य पश्चिम बंगाल में न्यू जलपाईगुड़ी और दार्जिलिंग के बीच चलने वाली एक छोटी लाइन की रेलवे प्रणाली है। इसका निर्माण 1879 और 1881 के बीच किया गया था और इसकी कुल लंबाई 78 किलोमीटर है। इसकी ऊंचाई स्तर न्यू जलपाईगुड़ी में लगभग 328 फीट से लेकर दार्जिलिंग में 7,218 फुट तक है। और आपको जानकर हैरानी होगी कि इसका निर्माण अंग्रेज़ों ने सन् 1882 में ईस्ट इंडिया कंपनी के मज़दूरों को पहाड़ों तक पहुंचाने के लिए किया था। तब का दार्जिलिंग शहर आज के दार्जिलिंग से बिलकुल जुदा था तब वहां सिर्फ 1 मोनेस्ट्री, ओब्ज़र्वेटरी हिल, 20 झोंपड़ियां और लगभग 100 लोगों की आबादी थी। पर आज यह नज़ारा बिलकुल बदल चुका है। आज दार्जिलिंग हिमालयी रेल को यूनेस्को द्वारा नीलगिरि पर्वतीय रेल और कालका शिमला रेलवे के साथ भारत की पर्वतीय रेल के रूप में विश्व धरोहर स्थल के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।

Darjeeling Himalayan Railway station


 यह एक अनोखा अनुभव है जिसको देखने प्रतिवर्ष लाखों लोग आते हैं। सन् 2011 में तिनधरिया और पगलाझोरा में भारी भूस्खलन के कारण डीएचआर ने टॉयट्रेन सेवा को निलंबित कर दिया था। पहाड़ों में हुए उस भूस्खलन के कारण दार्जिलिंग हिमालयी रेल की सेवा न्यू जलपाईगुड़ी से पिछले चार वर्षों से बाधित थी लेकिन इसी वर्ष दिसंबर में इसका संचालन दुबारा शुरू कर दिया गया है। न्यू जलपाईगुड़ी से दार्जिलिंग तक की सेवा आधुनिक डीजल इंजनों द्वारा उपलब्ध करवाई जाती है। जबकि पुराने ब्रिटिश निर्मित बी श्रेणी के भाप इंजन, डीएचआर 778 का संचालन  दैनिक पर्यटन गाड़ियों के लिए दैनिक कुर्सियांग-दार्जिलिंग वापसी सेवा और दार्जिलिंग से घूम (भारत का सबसे ऊंचा रेलवे स्टेशन) के लिए किया जाता है। इस जॉय राइड का अनुभव लेने के लिए आपको अपनी जेब थोड़ी ढ़ीली करनी होगी।

Tindharya railway station


सिलीगुड़ी को दार्जिलिंग की पहाड़ियों से जोड़ने वाली टॉयट्रेन सेवा पर्यटकों के बीच मनोरम दृश्यों को लेकर काफी लोकप्रिय है इसलिए टिकट पहले से ही बुक ज़रूर करवा लें।
दार्जिलिंग हिमालयी रेल की लम्बाई सिलीगुड़ी से दार्जिलिंग के बीच 78 किमी (48 मील) की है। जिसमें 13 स्टेशन न्यू जलपाईगुड़ी, सिलीगुड़ी टाउन, सिलीगुड़ी जंक्शन, सुकना, रंगटंग, तिनधरिया, गयाबाड़ी, महानदी, कुर्सियांग, टुंग, सोनादा, घुम और दार्जिलिंग पड़ते हैं। न्यू जलपाईगुड़ी के समतल रेलवे स्टेशन से शुरू हुई यह यात्रा हर मोड़ पर कुछ अनोखा लिए हुए बैठी है। शहर के बीचों बीच से गुज़रती दो डिब्बों की यह रेल गाड़ी लहराती हुई चाय बागानों के बीच से होकर महानंदा वाइल्ड लाइफ सेंचुरी के भीतर जंगलों में प्रवेश करती है। इसकी रफ़्तार अधिकतम 20 किमी प्रति घंटा है, लेकिन आप चाहें तो दौड़ कर पकड़ सकते हैं। हरयाली से भरे जंगलों को पार करती हुई यह पहाड़ों में बसे छोटे छोटे गांवों से होती हुई आगे बढ़ती है। रास्ते में कई जगह रिवर्स लाइन भी पड़ती हैं। जहां रेलवे का एक कर्मचारी घने जंगल में मुस्तैदी से ट्रेन के लिए लाइन बदलता है और एक बार फिर यह सुहाना सफर शुरू हो जाता है। इन हसीन वादियों में देखने के लिए बहुत कुछ है, जैसे पहाड़ी झरने, वनस्पति, सुन्दर सजीले पक्षी और मुस्कुराते पहाड़ी लोग।
यहां के लोग प्रकृति के साथ जीने की कला जानते हैं। इनके घर छोटे मगर सुन्दर होते हैं। आसपास इतनी हरयाली और पेड़ पौधों के बावजूद इनके घर के आसपास कितने ही सुन्दर फूलदार पौधे लगे होते हैं।

Toy Train entering in the Mahananda Wildlife Sanctuary


In the middle of the jungle


कितने ही लूप और ट्रैक बदलती हुई यह ट्रेन पहाड़ी गांव और क़स्बों से मिलती मिलाती किसी पहाड़ी बुज़ुर्ग की तरह 6-7 घंटों में धीरे-धीरे सुस्ताती हुई दार्जिलिंग पहुंचती है। इस रास्ते पर पड़ने वाले स्टेशन भी अंग्रेज़ों के ज़माने की याद ताज़ा करवाते हैं। इस ट्रेक पर पड़ने वाला कुर्सियांग एक बड़ा शहर है, यहीं दार्जिलिंग से कुछ पहले घूम स्टेशन पड़ता है. भारत में सबसे ऊंचाई लगभग 7407 फीट पर स्थित माना जाने वाला रेलवे स्टेशन- घूम यहीं स्थित है। इसे सबसे ऊंचाई पर स्थित होने का गौरव प्राप्त है। यहाँ से आगे चलकर बतासिया लूप पड़ता है। यहां एक शहीद स्मारक है,यहां से पूरा दार्जिलिंग नज़र आता है। शाम होते होते यह टॉय ट्रेन आपको दार्जिलिंग पहुंचा देती है। यह यात्रा दार्जिलिंग में समाप्त हो जाती है।

Some useful information

 टॉय ट्रेन की इस अविस्मरणीय यात्रा करते हुए आप किसी और दौर में ही पहुंच जाते हैं। जहां आजकल की ज़िन्दगी जैसी आपाधापी नहीं है। एक लय है हर चीज़ में, प्रकृति के साथ तारतम्य बिठाती हुई ज़िन्दगी है,जो इन पहाड़ी गांवों में बसती है, और फूलों-सी खिलती है।

Darjeeling Himalayan Railway logo



फिर मिलेंगे दोस्तों, भारत दर्शन में किसी नए शहर की यात्रा पर, तब तक खुश रहिये, और घूमते रहिये,

KK@ Darjeeling Himalayan Railway 

एक शेर मेरे जैसे घुमक्कड़ों को समर्पित
"सैर कर दुनियां की ग़ाफ़िल ज़िन्दगानी फिर कहां,
 ज़िन्दगानी गर रही तो नौजवानी फिर कहां "
आपकी हमसफ़र आपकी दोस्त

डा० कायनात क़ाज़ी

सोमवार, 23 नवंबर 2015

भारतीय अरेबिक स्थापत्यकला का उत्कृष्ठ नमूना श्रीनगर की जामा मस्जिद

कश्मीर चौथा दिन 
इस श्रंखला की पिछली पोस्ट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें : कश्मीर तीसरा दिन 

Main building of Jamia Masjid


कश्मीर में सूफिज़्म की जड़ों की तलाश अभी बाक़ी है मेरे दोस्त। इस सफर का अगला पड़ाव है यहाँ की  जामा मस्जिद। भीड़ भाड़ से भरे पुराने शहर यानी की डाउन टाउन में यह जगह सुकून देने वाली है। मैं डाउन टाउन की ऊंची नीची सड़कों को लांघती हुई जामा मस्जिद पहुंचती हूं। जामा  मस्जिद के दरवाज़े पर बने भारतीय सेना का बंकर मेरा बेदिली से स्वागत करता है। पूरे भारत में बेधड़क घूमने वाली मुझ यायावर के लिए यह एक अच्छा संकेत नहीं है। लोगों से खचाखच भरे मुहल्ले के बीच  बंकर होना आंखों को थोड़ा चुभता है।

Beautiful Indo-Saracenic architecture @Jamia Masjid


 हमारे देश में स्मारकों के बाहर सुरक्षा तो होती है पर बंकर बना कर फ़ौज को चौबीसों घण्टे पहरा देना पड़े ऐसे बुरे हालात तो कहीं नहीं हैं। बंकर के बाहर फौजी अपनी शिफ़्ट बदल रहे थे। मेरे दिमाग़ में एक सवाल था जिसकी जिज्ञासा में शांत करना चाहती थी। मैंने अपने ऑटो वाले से पूछा,- ख़ुदा के घर के बाहर यह बंकर क्यों ?क्या ज़रूरत है इसकी ?
मेरा ऑटो वाला एक 19 -20 बरस का कश्मीरी नौजवान था। वह बड़े ही जोश से बोला,-" जुम्मे के रोज़ यहां बहुत लोग नमाज़ अदा करने आते हैं और हमारे नेता मीर वाइज़ उमर फ़ारूख़ तक़रीर करते  हैं।"
मुझे उसकी बात समझ नहीं आई। क्यूंकि जुम्मे की नमाज़ से पहले धार्मिक गुरु लोगों को सम्बोधित करते हैं और जीवन से जुड़ी अच्छी बातों को बताते हैं, ऐसा सभी जगह होता है। मैंने वज़ाहत करनी चाही,-" इसके लिए बंकर की क्या ज़रूरत है ?" 
उसने बताया,-"तक़रीर के बाद पथराव होता है, इसलिए।"
पथराव ? मुझे हैरानी हुई। 
पथराव क्यों ? मैंने पूछा। 
इस्लाम को बचाने के लिए ? वह बोला 
मगर किससे ? इस्लाम में कहां लिखा है कि पथराव करो ? मैंने पूछा 
बहन, आप समझी नहीं ,वह पुरअमन तरीक़े से पथराव होता है, उसने मुझे समझाया। 
मैं वाक़ई नहीं समझी , यह पुरअमन तरीक़े से पथराव क्या  होता है ? 
पथराव पुरअमन कैसे हो सकता है? मेरी समझ से परे था। यह था कश्मीर का एक और रूप … 
इस बातचीत से यह ज़रूर साफ हो गया कि यहां भारतीय सेना के बंकर की ज़रूरत क्यों है। मैंने ख़ुदा के घर में दाख़िल होते हुए इस हसीन वादी के लिए अमन और चैन की दिल से दुआ की। ख़ुदा यहां के भोले भाले लोगों को सद्बुद्धि दे। 


Lady praying in the courtyard@Jamia Masjid 

आएं अंदर चलकर इस खूबसूरत ईमारत को देखते हैं। इस मस्जिद का निर्माण सुल्तान सिकंदर ने करवाया था। इस मस्जिद का ताल्लुक़ सूफ़ीज़्म से ऐसे है कि इसे बनवाने की हिदायत सुल्तान सिकंदर को शाह ए हमदान के बेटे मीर मुहम्मद हमदानी ने दी थी। बाद में उनके पुत्र ज़ैनुल अबिदीन ने  इसे और बड़ा बनवाया। यह एक विशाल मस्जिद है जिसमे एक वक़्त में लगभग तैतीस हज़ार लोग नमाज़ अदा कर सकते हैं। यह मस्जिद भारतीय और अरेबिक वास्तुकला का उत्कृष्ठ नमूना है। हम सदर दरवाज़े से दाख़िल होते ही इसके बड़े कोर्टयार्ड में पहुंचे। यह दालान बड़े बड़े लकड़ी के खम्बों से घिरा हुए हैं। इस मस्जिद में लगभग 377 लकड़ी के खम्बे हैं। जिनके बीच कश्मीरी क़ालीन बिछे हुए हैं जिनपर लोग नमाज़ पढ़ते हैं। इन दालानों के पार एक खूबसूरत गार्डन है जिसके बीचों बीच एक फुव्वारा है जिसके चारों तरफ बैठ कर लोग वुज़ू किया करते हैं। यहां बहुत शांति है। इस मस्जिद में महिलाऐं भी जा सकती हैं, लेकिन उनको सिर ढक कर जाना होता है। इस मस्जिद के दरवाज़े सभी के लिए खुले हैं। यहां कोई भी निसंकोच जा सकता है। मीर वाइज़ उमर फ़ारूख़ इस मस्जिद के मुख्य इमाम हैं। 

Local Kids @Jamia Masjid


आप ऐसे ही बने रहिये मेरे साथ.

हिमालय के अनेक रूपों में से एक के साथ...

कल हम चलेंगे सुबह-सुबह डल लेक के अंदर लगने वाली वेजिटेबल मार्केट देखने।

KK@Jamia Masjid


तब तक के लिए खुश रहिये और घूमते रहिये।

आपकी हमसफर आपकी दोस्त

डा० कायनात क़ाज़ी





शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2015

हिमालय की पुकार…इस बार कश्मीर

हिमालय की पुकारइस बार कश्मीर




पूरे हिमालय मे एक तिलिस्म है जो मुझे अपनी ओर खींचता रहता है. अभी हिमाचल की यात्रा को कुछ ज़्यादा दिन भी नही गुज़रे हैं कि कश्मीर की यात्रा का विधान बन गया है. जबकि मैने पूरी कोशिश की थी कि बीच में एक बार दक्षिण भारत का एक चक्कर लगा कर आऊंगी पर ऐसा हो ना सका. और एक बार फिर मैं हिमालय की खूबसूरती से रूबरू होने निकल पड़ी हूं कश्मीर की वादियों मे.
यह टूर लगभग दस दिन का टूर रहेगा.जिसमें मैने बहुत सारी जगहों को देखने का नही सोचा है. इस बार मैं जहां भी जाऊंगी सुकून से वक़्त गुज़ारुंगी, और तब तक उस जगह को नही छोड़ूंगी जब तक मेरा दिल नही भर जाता. मेरी इस यात्रा मे शामिल हैं यह जगहें:
1. श्रीनगर
2. पहलगाम
3. ऐपल वैली
4. अवन्तीपुरा मंदिर अवशेष
5. अरू वैली
6. लिद्दर वैली
7. मार्कंडे मंदिर, मट्टन, अनंतनाग
8. तांगमर्ग
9. गुलमर्ग
हमेशा की तरह मैं अपने कंप्यूटर पर बैठ कर जितनी रिसर्च कर सकती थी वो सब की. किसी जगह पर जाने से पहले वर्चूअली पहुंचने के लिए इंटरनेट बड़ा ही आसान तरीका है. मैं कोशिश करती हूँ कि उस जगह से जुड़ी ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी जुटा लूं ताकि कोई असुविधा ना हो, और फिर कश्मीर जाने को लेकर थोड़ी सतर्कता भी ज़रूरी है. मुझसे पहले गए हुए लोगों के रिव्यूज़ और मशवरे मेरे बड़े काम आते हैं. वैसे तो मैं किसी एक ब्लॉगर को फॉलो नही करती पर बहुत सारे ब्लॉगरस के आर्टिकल और रिव्यू पढ़ती हूँइन सब से बड़ी मदद मिलती हैमेरी आइटिनरी पूरी तैयार है. बस यह तय नही किया है कि मैं किस जगह पर कितने दिन रुकने वाली हूं..ऐसा शायद मैने पहली बार किया है कि अपनी आइटिनरी को इतना लूज़ रखा है..शायद खुद पर एतमाद बढ़ने की वजह से ऐसा कर पाई हूं..कहते हैं बंधनों के कुछ सिरे खुले भी छोड़ने चाहिए..थोड़ी ताज़ी हवा आती जाती रहती है..जिस तरह इश्क़ के अलग-अलग लेवल्ज़ होते हैं शायद ट्रेवलिंग के भी अलग-अलग लेवल होते हैं..पहले आप ट्रेवल करने के ख्वाब भर देखते हैं और सोचा करते हैं कि एक दिन मैं वहां जाऊंगा,ऐसा करूंगा वैसा करूंगाकुछ साल शायद आप ऐसे ही ख़्यालों मे निकाल देते हैं. मैनें भी अपनी ज़िंदगी के शुरुवाती 20 साल ऐसे ही सपने संजोने में निकाले हैं, और उन बीस सालों के अगले पांच साल खुद के ट्रेवलर बनने की प्लॅनिंग मे निकाले हैं, और उन पांच सालों के अगले कुछ साल मैने ट्रेवल शुरू करने और ग्रुप मे ट्रॅवेल करने मे निकाले हैं.मुझे लगता है कि यह अलग अलग मुक़ाम हैं ट्रॅवेल के, जिनहें शायद सबको ही तय करना पड़ता होगाअब हर कोई तो इबने बतुता नही हो सकता जो पच्चीस साल की उम्र मे ही दुनिया देखने निकल पड़ा था और अगले पच्चीस बरस तक घर वापस नही लौटा था
जैसे इश्क़ के सात मुकाम होते हैं, दिलकशी,ऊन्स, मुहब्बत,अक़ीदत, इबादत,जुनून और मौत. वैसे ही ट्रेवल के भी सात मुक़ाम होते हैं. जिस तरह मुझे ट्रेवल और फोटोग्राफी से लगाव है मुझे लगता है कि इश्क़ के यह सात मुक़ाम मेरे लिए ट्रेवल और फोटोग्राफी से इश्क़ के सात मुक़ाम बन गए हैं।

ट्रेवल और फोटोग्राफी से इश्क़ के सात मुकाम
1.             दिलकशी- आकर्षण attraction
2.             ऊन्स- infatuation
3.             मुहब्बत-लव love
4.             अक़ीदत- credence
5.             इबादत- worship
6.             जुनून- obsession
7.             मौत- death
शायद मैं अभी तीसरे मुक़ाम पर हूं. ट्रेवल मे दिलकशी थी इसीलिए बचपन से ही इसके बारे मे सोचा करती थी. जब फिल्में देखती थी और कोई नज़ारा मुझे अच्छा लगता तो दिल करता की उड़ कर वहां पहुंच जाऊं...शायद सभी का दिल यही करता होगा पर मैं इसके अलावा एक बात और सोचा करती थी उस नज़ारे को देख करजहां एक तरफ उस दिलफ़रेब खूबसूरती मुझे अपनी ओर आकर्षित करती थी वहीं दूसरी ओर मैं सोचती कि यह तस्वीर क्लिक कहां खड़े हो कर की गई होगी? उस वक़्त कैमरामैन कहां होगा? जितना लुभावना वो मंज़र होता था उसे ज़्यादा दिलफ़रेब यह अहसास होता था कि काश मैं भी ऐसी तस्वीरें खींच पाऊंऔर आज मैं बिल्कुल वैसा ही कर पाती हूं जैसा की कभी सोचा करती थी दिलकशी और उन्स के दोनों मुक़ाम पार कर चुकी हूं और अब मुहब्बत के मुक़ाम पर हूं। मुझे मुहब्बत है फोटोग्राफी और ट्रेवल दोनों से। देखा जाए तो मैं इन दोनों को एक दूसरे से अलग मानती भी नहीं।

कश्मीर जाने से पहले मुझे कई लोगों ने माना किया कि वहां ना जाया जाए पर मेरा दिल ना माना. हमारे देश मे ऐसा कौनसा हिस्सा हो सकता है जहां जाया ना जा सके? और फिर भय तो वैसे भी मुझे छू कर भी नही गया है. मेरे कुछ कश्मीरी दोस्त और जाननेवाले हैं मैंने एक बार उनसे फोन करके हालत का जायज़ा लिया. सभी ने मुझे एक ही बात कही कि आप आराम से आ सकती हैं. कोई परेशानी नही है वादी मे .मैनें भी अल्लाह का नाम लिया और चल दिए श्रीनगर. हमारी फ्लाइट ने दोपहर को श्रीनगर एयरपोर्ट पर लैंड किया. एयरपोर्ट की बेनूरी ने हमारा स्वागत कियायह एयरपोर्ट एयरपोर्ट कम और मिलिटरी बेस ज़्यादा लग रहा था. मैने टूरिस्ट इन्फर्मेशन डेस्क से जाकर कुछ जम्मू कश्मीर टूरिज़्म के पैम्फलेट लिए, पर यह डेस्क भी बदइंतज़ामी का शिकार थी. वहां पर टूरिस्ट मैप नही था और ना ही और बुकलेट्स..जोकि आम तौर पर टूरिस्ट्स के काम की जानकारियां समैटे होती है. मुझे समझ नही आता कि राज्य सरकारें टूरिज़्म के नाम पर हर साल एक नया चमचमाता विज्ञापन तो टीवी पर दिखा लोगों को अपने प्रदेश घूमने आने की दावत तो बड़ी शान से देती हैं पर ग्राउंड ज़ीरो पर तैयारी क्यूं नही करती हैं? मैने सिर्फ़ एक रात के लिए होटल बुक किया हुआ था. बाक़ी दिनों के लिए कुछ पहले से बुक नही किया था. मैने एयरपोर्ट से बाहर निकल कर प्रीपेड टेक्सी बुक की और निकल पड़ी श्रीनगर की तरफ. एयरपोर्ट से मेरा होटल जोकि डल झील के पास बुलवार्ड रोड पर ही है, जिस की दूरी एयरपोर्ट से लगभग 17 किमी थी. हमने 45 मिनट मे यह दूरी तय की. होटल मे चेक इन किया और अपनी पहली शिकारा राइड के लिए डल झील की तरफ चल दिए.
आगे क्या हुआ ?
इंतिज़ार कीजिये अगली पोस्ट का। 
तब तक के लिए, घूमते रहिये और खुश रहिये। 

आपकी हमसफ़र आपकी दोस्त 
डा ० कायनात क़ाज़ी