India's First Hindi Travel Photography Blog: Home

कुछ पंक्तियां इस ब्लॉग के बारे में :

प्रिय पाठक,
हिन्दी के प्रथम ट्रेवल फ़ोटोग्राफ़ी ब्लॉग पर आपका स्वागत है.….
ऐसा नहीं है कि हिन्दी में अच्छे ब्लॉग लिखने वालों की कमी है। हिन्दी में लोग एक से एक बेहतरीन ब्लॉग्स लिख रहे हैं। पर एक चीज़ की कमी अक्सर खलती है। जहां ब्लॉग पर अच्छा कन्टेन्ट है वहां एक अच्छी क्वालिटी की तस्वीर नहीं मिलती और जिन ब्लॉग्स पर अच्छी तस्वीरें होती हैं वहां कन्टेन्ट उतना अच्छा नहीं होता। मैं साहित्यकार के अलावा एक ट्रेवल राइटर और फोटोग्राफर हूँ। मैंने अपने इस ब्लॉग के ज़रिये इस दूरी को पाटने का प्रयास किया है। मेरा यह ब्लॉग हिन्दी का प्रथम ट्रेवल फ़ोटोग्राफ़ी ब्लॉग है। जहाँ आपको मिलेगी भारत के कुछ अनछुए पहलुओं, अनदेखे स्थानों की सविस्तार जानकारी और उन स्थानों से जुड़ी कुछ बेहतरीन तस्वीरें।
उम्मीद है, आप को मेरा यह प्रयास पसंद आएगा। आपकी प्रतिक्रियाओं की मुझे प्रतीक्षा रहेगी।
आपके कमेन्ट मुझे इस ब्लॉग को और बेहतर बनाने की प्रेरणा देंगे।

मंगल मृदुल कामनाओं सहित
आपकी हमसफ़र आपकी दोस्त

डा० कायनात क़ाज़ी
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बुधवार, 28 अक्टूबर 2015

हिंदुस्तान का दिल देखो कैरावैन के साथ.…



Caravan from outside


इतने वर्षों की मेरी यात्राओं के दौरान एक कमी जो मैंने हमेशा महसूस की है वह है-पाबन्दी की। कहीं से जल्दी निकलने की और कहीं पर जल्दी पहुंचने की। 
 मैने खुद से यह सवाल बार-बार किया है कि हम सब आख़िर घूमने क्यों जाते हैंऐसा क्या मिलता है कहीं घूमने जाने मे, जो आपको अपने घर मे, अपने शहर मे नही मिलता। बहुत सोचने के बाद मैने यह पाया है कि हम घूमने इसलिए जाते हैं कि हम अपने मन कोअपने दिलो दिमाग़ को हमारी रोज़ कि आपाधापी भरी ज़िंदगी से थोड़ा सुकून दे सकें, ब्रेक दे सकें। फिर से तरोताज़ा हो सकें। हम सब ऐसा सोच कर ही छुट्टियों का प्लान करते हैं कि रोज़ के अपने सेट रूटीन से थोड़ा ब्रेक लिया जाए। कुछ दिन प्राकृति के साथ सुकून से गुज़ारे आए। जहां पर ऑफिस जाने कि हड़बड़ाहट ना हो, कहीं टाइम से पहुंचने की बेचैनी ना हो
शायद खुद को पंख फैला कर उड़ने का, बंधनों से मुक्ति काआज़ादी का अनुभव करवाना चाहते हैं हम सभी। कुछ दिन बिना किसी बोझ और मानसिक तनाव के। शायद हम सभी ऐसा ही कुछ सोच कर घूमने का प्लान करते हैं। पर वास्तव में होता क्या होहम छुट्टी प्लान करते हैं,पहले से टिकट बुक करते हैं, कहां कहां जाएंगे उसकी सारी जानकारी जुटाते हैं और फिर होटल बुक करते हैं, जैसे दो दिन शिमला, एक दिन कुल्लू और दो दिन मनालीऔर फिर इसी हिसाब से हर जगह होटल भी बुक करते हैं और यह बिल्कुल भूल जाते हैं कि हम जिन बंधनों और तनावों से बचने के लिए छुट्टी पर जा रहे थे व बंधन तो हम खुद अपने साथ लिए जा रहे हैं शिमला पहुंचने से पहले ही चिंताएं घेर लेती हैं कि टाइम से नही पहुंचे तो कहीं होटलवाला रूम किसी और को ना दे दे। फिर शिमला पूरी तरह से एंजाय भी नही किया होता कि टाइम से कुल्लू पहुंचने की चिंता घेर लेती है, और अगर खुद ड्राइव कर रहे हों हो फिर चिंता और बढ़ जाती है। टाइम से पहुंचने कि चिंता, रात ज़्यादा ना हो जाए इसकी चिंता। फिर जैसे तैसे कुल्लू पहुंच भी गए तो वहां भी सुकून से रहा नही जाता, और वहां से और आगे जाने फिर वापस घर पहुंचने कि चिंता लगातार हमारे दिमाग को घेरे रहती है। और इस तरह पूरा ट्रिप चिंता मे ही निकल जाता है। काश के कभी ऐसा होता कि कहीं पहुंचने कि चिंता ना होती, जहां रुकने का मन करे रुक गए, और जितने दिन ठहरने का मन करे ठहर गए। मैं अक्सर हिमालय मे घूमते हुएराजिस्थान मे घूमते हुए हमेशा से ऐसा सोचती थी। कुछ जगहें ऐसी होती हैं कि मन करता है कि यहां से जाया ही ना जाए। एक दो दिन और रुका जाए। पर मैं ऐसा कभी कर नही पाई। पहले से ही मेरा शेड्यूल इतना कसा हुआ होता था कि कहीं कोई गुंजाइश ना रहती। लेकिन इस बार जब मध्य प्रदेश पर्यटन के पर्यटन मेले में गई तो कुछ ऐसा देखने को मिला जिससे देख दिल खुश हो गया। मैं बात कर रही हूं- कैरावैन की। आऐं आपको भी इसका अंदर से दीदार करवाते हैं।
Caravan from inside-Drawing room
 कैरावैन एक ऐसी गाड़ी है,जोकि एक बस के बराबर लम्बी और चौड़ी है। जिसमे आपका पूरा का पूरा घर समाया हुआ है। आप अपने पूरे परिवार के साथ इसमे घूम सकते हैं। इसमे घूमते हुए आपको होटल बुक करने कि भी ज़रूरत नही है। आप का बेडरूम, ड्रॉयिंग रूम, बाथरूम यहां तक कि किचन भी इसी मे मौजूद है। इस कैरावैन में भारतीय कुकिंग के साथ साथ वेर्स्टर्न कुकिंग के लिए भी पूरा इंतज़ाम किया गया है। 
indore kitchen@Caravan
यहां के सिटिंग एरिआ में बैठ कर आप बाहर के नज़रों का मज़े से आनंद ले सकते हैं। 
Sitting area@Caravan

आप जहां चाहें वहां रोक कर प्रकृति की सुंदरता का आनंद ले सकते हैं और खाना भी बना सकते हैं। ज़रा सोच के देखिये किसी नदी के किनारे घांस के मैदान में एक तरफ आपने अपना कैरावैन खड़ा किया हो और खुले आकाश के नीचे आराम कुर्सी पर बैठ कर शाम की चाय की चुस्कियों का मज़ा लेते हुए सनसेट को देखना कितना ख़ुशनुमा एहसास होगा,और ऐसे में आपके साथ आपका कोई ख़ास हो तो वो शाम कितनी दिलफरेब बनजाएगी।

इस कैरावैन मे आठ लोगों के लिए जगह है। अगर आपका परिवार छोटा है तो आप छोटा कैरावैन भी ले सकते हैं। इसमे आधुनिक सुख सुविधाओं का पूरा ख़्याल रखा गया है। यहां एलसीडी टीवी, डी टी एच और वाई-फ़ाई भी मौजूद है। यह समझिए कि आप को चलता फिरता स्टूडियो अपार्टमेंट मिल रहा है। जहां है बैठने के लिए आरामदायक सोफ़ा। पढ़ने के लिए स्टडी टेबल है। 
TV Lounge@Caravan

Reading area@Caravan

Outdoor kitchen @Caravan

Restroom@Caravan

 भारत में कैरावैन टूरिज़्म की अनोखी शुरुवात हुई है हिन्दुस्तान के दिल से। मध्य प्रदेश टूरिज़्म ने पर्यटकों की बदलती ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए भारत के लिए नया माने जाना वाला कौन्सेप्ट कैरावैन टूरिज़्म शुरू किया है। विदेशों मे तो यह चलन बहुत पुराना है पर भारत के लिए अभी नया है। कैरावैन मे भ्रमण करने के दौरान आपकी सुरक्षा का ख़ास ध्यान रखा गया है इसलिए कैरावैन में एक ड्राइवर और क्लीनर की व्यवस्था भी की गई है। जिससे ड्राइव करने के झंझट से भी छुटकारा मिलता है। अगर आप रात में ट्रॅवेल ना करना चाहें तो एमपी टूरिज़्म के किसी भी होटल की पार्किंग मे अपना कैरावैन लगा कर रात बिता सकते हैं। यह पूरी तरह सुरक्षित होते हैं। वैसे आपके क़ीमती समान के लिए अंदर लॉकर भी दिया गया है। अंतर्राष्ट्रीय गुणवत्ता वाला यह कैरावैन आपका मन मोह लेगा। आप भी जीवन में एक बार इससे यात्रा करना ज़रूर चाहेंगे। यह अनुभव अपने आप में बड़ा ही अनोखा है। मुझे विश्वास है कि कुछ वर्षों में कैरावैन टूरिज़्म हमारे देश में पर्यटन का तरीका ही बदल देगा। यह एक ऐसा विकल्प है जिसके ज़रिये हम अपने घर के बुज़ुर्गों को भी आराम के साथ घूमने ले जा सकते हैं। 

फिर मिलेंगे दोस्तोंघुमक्कड़ी से जुड़े किसी नए अफ़साने के साथ

तब तक के लिए खुश रहियेघूमते रहिये।

और ऐसे ही बने रहिये मेरे साथ.

आपकी हमसफ़र आपकी दोस्त

डा० कायनात क़ाज़ी



मंगलवार, 23 जून 2015

Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya_Part-2

एक मुलाक़ात सांस्‍कृतिक विरासत से Part-2


Tribal Art@Indira Gandhi Rashtriya Manav SangrahalayaIgrms Bhopal​

आज मैं वीथी संकुल देखने एक बार फिर पहुँच गई हूँ इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय। विथी संकुल एक भव्य भवन है. जहाँ तेरह कला दीर्घा हैं.जिसका स्थापत्य अनूठा है। वीथी संकुल परिसर मे भारत के सबसे बडे 1001 बातियों वाले विशाल दीप-माला को रखा गया है. यहाँ वर्ष भर होने वाले संस्कृतिक कार्यक्रमों का उद्घाटन इसी बड़े से दीपक को प्रज्वलित करके किया जाता है. यह संग्रहालय ढालदार भूमि पर 10 हजार वर्ग मीटर के क्षेत्रफल में फैला है। प्रथम कक्ष में मानव जीवन के विकास की कहानी को चरणबद्ध रूप से दर्शाने के लिए माडलों व स्केचों का सहारा लिया गया है। देश के विभिन्न भागों से जुटाए गए साक्ष्यों को भी यहाँ रखा गया है।


Tribal Art@Indira Gandhi Rashtriya Manav SangrahalayaIgrms Bhopal​

मानव विकास और प्रगेतिहासिक काल के दृश्‍यों को यहाँ सॅंजो कर रखा गया है.आदिमनव के जीवन का चित्रण मॉडेल द्वारा संझाया गया है. इस दीर्घा को पार करके मैं अंदर की दीर्घा मे प्रवेश करती हूँ.


Tribal Art@Indira Gandhi Rashtriya Manav SangrahalayaIgrms Bhopal​

 यहाँ मुझे विभिन्न समाजों के जनजीवन की बहुरंगी झलक तो देखने को मिलती है साथ ही भारत भर मे फेले हुए अलग-अलग क्षेत्रों के परिधानसाजसज्जाआभूषणसंगीत के उपकरणपारंपरिक कलाहस्तशिल्पशिकारमछली पकङने के उपकरणकृषि उपकरणऔजार व तकनीकीपशुपालनकताई व बुनाई के उपकरणमनोरंजनउनकी कला से जुडे नमूने से भी परिचय मिलता है। मैं एक दीर्घा से गुज़रती हुई दूसरी दीर्घा मे पहुँच जाती हूँ. 


Warly Tribal Art@Indira Gandhi Rashtriya Manav SangrahalayaIgrms Bhopal​


एक के बाद एक देखने लायक वस्तुएँ, जिन्हें देखते हुए यह अहसास होता है की इन्हे यहाँ कितने जतन करके सॅंजो कर रखा गया है. कहीं कश्मीरी जनजातियों के घर की झलक तो कहीं उड़ीसा के लोगों का जीवन दर्शन, कहीं कोस्टल गाँवों की छाया तो कहीं कुमांऊ लोगों के बरतन. सब कुछ सहेजा हुआ. 



Tribal Art@Indira Gandhi Rashtriya Manav SangrahalayaIgrms Bhopal​

मैं टहलते टहलते एक दीर्घा में पहुँची तो वहाँ दीवारों पर मधुबनी आर्ट और बिहार के घरों की रसोई सजी हुई थी. मिट्टी का चूल्हा और उस मिट्टी से लिपि हुई दीवारें और फर्श..एक दीर्घा मे गई तो लगा की चेट्टीनॉड संप्रदाय जोकि दक्षिण मे पाया जाता है के किसी पारंपरिक घर मे आ गई हूँ. 


Tribal Art@Indira Gandhi Rashtriya Manav SangrahalayaIgrms Bhopal​




Tribal Art@Indira Gandhi Rashtriya Manav SangrahalayaIgrms Bhopal​


लकड़ी के बड़े-बड़े खंबे और उन पर नक्कारशी.एक वीथिका पूरी की पूरी मुखोटों से भरी हुई थी. हमारे देश मे आमतौर पर सभी संप्रदायों के धार्मिक अनुष्ठानों मे मुखोटों का प्रयोग होता रहा है, फिर चाहे व लद्दाख की मोनेस्ट्री मे होने वाल उत्सव हों या फिर दक्षिण मे मनाए जाने वाले पर्व हों. इस दीर्घा मे देश के कोने कोने से जुटाए गए मुखोटों को रखा गया है.


Tribal Art@Indira Gandhi Rashtriya Manav SangrahalayaIgrms Bhopal​

 हैरानी की बात यह है की इस संग्रहालय की स्थापना भोपाल मे ना होकर दिल्ली मे हुई थी. यह संग्रहालय 21 मार्च 1977 में नई दिल्ली के बहावलपुर हाउस में खोला गया था किंतु दिल्ली में पर्याप्त जमीन व स्थान के अभाव में इसे भोपाल लाया गया।


Tribal Life@Indira Gandhi Rashtriya Manav SangrahalayaIgrms Bhopal​


 चूँकि श्यामला पहाडी के एक भाग में पहले से ही प्रागैतिहासिक काल की प्रस्तर पर बनी कुछ कलाकृतियाँ थींइसलिए इसे यहीं स्थापित करने का निर्णय लिया गया। मुझे विथी संकुल देखते हुए बाकी का आधा दिन निकल गया. लेकिन मानव संग्रहालय का आधे से ज़्यादा हिस्सा देखना बाक़ी था। अभी तो कई क्षेत्र बाकी हैं जैसे कोस्टल विलेजडेज़र्ट विलेज, हिमालयन विलेज और पत्थर पर बनी प्रगैतिहासिक काल के चित्र. इसके लिए मुझे कल फिर आना होगा.यह संग्रहालय सोमवार और राष्ट्रीय अवकाश को बंद रहता है.


Tribal Art@Indira Gandhi Rashtriya Manav SangrahalayaIgrms Bhopal​

Tribal Art@Indira Gandhi Rashtriya Manav SangrahalayaIgrms Bhopal​


इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय को इस उद्देश्य के साथ खोला गया है ताकि लोग मानव जाति के इतिहास के बारे में जान सकें और मानव विज्ञान के बारे में शिक्षित हो सकें। इसी उद्देश्‍य से यह संग्रहालय वर्ष भर आउटडोर और इनडोर प्रर्दशनी का आयोजन करवाता रहता है। इस संग्रहालय में भारत की समृद्ध सांस्‍कृतिक विरासत की प्रर्दशनी को लगाया जाता है जो देश की संस्‍कृति के बारे में गहरी अंर्तदृष्टि प्रदान करता है। मेरे हिसाब से अपने बच्चों को यहाँ एक बार ज़रूर लेकर आएं। हो सकता है यहाँ लाकर  आप इन गर्मियों की छुट्टी के बहाने अपने बच्चों को ज्ञान के भंडार से रूबरू करवा सकें। बरसात के आते ही यह जगह हरयाली से भर जाती है। यहाँ आकर आप एक पूरे दो दिन की पिकनिक भी मना सकते हैं। यहाँ इतना कुछ देखने को है कि आपका समय ख़त्म हो जाएगा पर इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में देखने के लिए कुछ न कुछ ज़रूर रह जाएगा। जिसे देखने आपको भोपाल एक बार फिर आना पड़ेगा। 


Tribal Art@Indira Gandhi Rashtriya Manav SangrahalayaIgrms Bhopal​

Tribal Art@Indira Gandhi Rashtriya Manav SangrahalayaIgrms Bhopal​

Tribal Art@Indira Gandhi Rashtriya Manav SangrahalayaIgrms Bhopal​

Tribal Art@Indira Gandhi Rashtriya Manav SangrahalayaIgrms Bhopal​

Tribal Art@Indira Gandhi Rashtriya Manav SangrahalayaIgrms Bhopal​



Tribal Art@Indira Gandhi Rashtriya Manav SangrahalayaIgrms Bhopal​



Madhubani Art@Indira Gandhi Rashtriya Manav SangrahalayaIgrms Bhopal​

Tribal Art@Indira Gandhi Rashtriya Manav SangrahalayaIgrms Bhopal​

Tribal Art@Indira Gandhi Rashtriya Manav SangrahalayaIgrms Bhopal​                    



कैसे जाएं

वायु मार्ग- भोपाल एयरपोर्ट  सिटी से 12 किमी. की दूरी पर है। दिल्‍लीमुंबई और इंदौर से यहां के लिए इंडियन एयरलाइन्‍स की नियमित फ्लाइटें हैं। ग्‍वालियर से यहां के लिए सप्‍ताह में चार दिन फ्लाइट्स हैं।

रेल मार्ग- भोपाल का रेलवे स्‍टेशन देश के विविध रेलवे स्‍टेशनों से जुडा हुआ है। यह रेलवे स्‍टेशन दिल्‍ली-चैन्‍नई रूट पर पडता है। शताब्‍दी एक्‍सप्रेस भोपाल को दिल्‍ली से सीधा जोडती है।भोपाल एक्सप्रेस भी दिल्ली से भोपाल जाने के लिए रात भर का समय लेती है. साथ ही यह शहर मुम्‍बईआगराग्‍वालियरझांसीउज्‍जैन आदि शहरों से अनेक रेलगाडियों के माध्‍यम से जुडा हुआ है।

सडक मार्ग- सांचीइंदौरउज्‍जैनखजुराहोपंचमढीजबलपुर आदि शहरों से आसानी से सडक मार्ग से भोपाल पहुंचा जा सकता है। मध्‍य प्रदेश और पडोसी राज्‍यों के अनेक शहरों से भोपाल के लिए नियमित बसें चलती हैं।

कब जाएं- नवंबर से फरवरी। वैसे भोपाल घूमने के लिए गर्मियों के दो महीने छोड़ कर कभी भी जाया जा सकता है। मानसून के आते ही भोपाल हरयाली से भर जाता है।


Map indira gandhi rashtriya manav sangrahalaya,Bhopal 


फिर मिलेंगे दोस्तोंभारत दर्शन में किसी नए शहर की यात्रा पर,
तब तक खुश रहियेऔर घूमते रहिये,

आपकी हमसफ़र आपकी दोस्त


डा० कायनात क़ाज़ी

Welcome to Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya_Part-1

एक मुलाक़ात सांस्‍कृतिक विरासत से Part-1
Gate No.1 

Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya


मैं जब छोटी थी और अपनी सामाजिक विज्ञान और भूगोल की किताबें पढ़ा करती थी तब उन किताबों मे बने अलग अलग प्रदेशों के लोगों, उनके घर, उनका जीवन, उनके रहन सहन की वस्तुएँ देख कर हमेशा चमत्कृत हुआ करती थी. मैं अपने ख़यालों की छोटी सी दुनिया मे उन जगहों की कल्पना करती थी और उन जगहों को देखना चाहती थी, उन्हें महसूस करना चाहती थी. मैं सोचती कि काश ऐसा हो की मेरी किताब के पन्नो मे बंद यह दुनिया मेरे सामने सजीव हो जाए. जिसे मे क़रीब से देखूं, स्पर्श करूँ, जानूं और समझूं..किताबों मे बने सपाट चित्र मेरी जिग्यासा को शांत ना कर पाते. मैं जब अपनी किताब में आदिवासियों के बारे मे पढ़ती तो सोचती कि सहरिया, भील, गोंड भरिया, कोरकू, प्रधान, मवासी, बैगा, पनिगा, खैरवार कोल, पाव भिलाला, बारेला, पटेलिया, डामोर आदि जनजातियाँ कैसा जीवन जीती होंगी? मैं उन्हें 3D मे देखना चाहती थी. मैने अपनी यह अनोखी ख्वाहिश शायद किसी से नही कही थी..जानती थी की वास्तविकता की दुनिया मे ऐसा शायद नही हो सकता कि हमारे देश मे पाई जाने वाली सभी जनजातियों के जीवन की झलक एक ही जगह पर देखी जा सकती है.


Map of 

Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya



पर यह मेरे बाल मान की ग़लतफहमी ही थी. वास्तव मे ऐसी जगह है जिसे देख कर आपको लगेगा की मानो बचपन की किताबें जो एक बच्चे को देश के लोगों से रूबरू करवाने का काम करती हैं किसी ने यहाँ खोल कर रख दी हैं.
मैं बात कर रही हूँ इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय, भोपाल की. यह एक अद्भुत जगह है और विडंबना यह है की इसके बारे मे लोग ज़्यादा नही जानते हैं..लोगों से मेरा मतलब बच्चों से है..दर असल पाँचवीं से लेकर दसवीं कक्षा तक जो बातें सामाजिक विज्ञान और भूगोल की किताबों मे बंद कक्षाओं मे साल दर साल पढ़ाई जाती हैं. उन बातों को एक छात्र यहाँ पर एक पूरा दिन बिता कर सीख सकता है, महसूस कर सकता है.पता नही हमारे सरकारी स्कूल इस तरफ इतने उदासीन क्यों होते हैं ऐसी जगाहें सरकारी लाल फीटाशाही की नज़र ज़्यादा हो जाती हैं..जोकि बच्चों की पहुंच से दूर बहुत दूर है.

Gate of Tribal Habitat


पिछले दिनों जब मेरा भोपाल जाना हुआ, और इत्तिफ़ाक़ से यह दिन मानव संग्रहालय का 39वाँ स्थापना दिवस (21 मार्च) था. तो मैने इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय देखने के लिए खास तौर पर एक पूरा दिन निकाला. मानव संग्रहालय देखने के लिए पूरा एक दिन भी कम पड़ने वाला था यह मुझे बाद मे पता चला. मैं भोपाल एक्सप्रेस से सुबह सुबह भोपाल पहुँची. भोपाल एक शांत और पहाड़ों की घाटी मे बसा सांस्कृतिक शहर है. मैने होटेल मे चेक इन किया और तैयार होकर मानव संग्रहालय देखने के लिए ऑटो किया. ऑटो वाला मुझे श्यामला हिल्स की पहाड़ियों पर वन विहार के नज़दीक मानव संग्रहालय के गेट नंबर 1 पर ले गया. इस संग्रहालय के तीन गेट हैं.

House from Southern  estates

यह अद्भुत संग्रहालय शामला हिल्स पर 200 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है, जहाँ 32 पारंपरिक एवं प्रागैतिहासिक चित्रित शैलाश्रय भी हैं। ऐसा कहा जाता है कि यह यह भारत ही नहीं अपितु एशिया में मानव जीवन को लेकर बनाया गया विशालतम संग्रहालय है। इसमें भारतीय प्ररिप्रेक्ष्य में मानव जीवन के कालक्रम को दिखाया गया है। इस संग्रहालय में भारत के विभिन्‍न राज्यों की जनजातीय संस्‍कृति की झलक देखी जा सकती है। यह संग्रहालय जिस स्‍थान पर बना है, उसे प्रागैतिहासिक काल से संबंधित माना जाता है। संग्रहालय खुलने का समय सुबह के 10 बजे से शाम पाँच बजे तक का होता है. मैं क्योकि सुबह जल्दी फोटो क्लिक करती हूँ इसलिए वहाँ जल्दी पहुँच गई थी.किसी तरह गेट पर दस बजने का इंतिज़ार किया और दस बजने के बाद ही सिक्यूरिटी गार्ड ने मुझे अंदर जाने दिया. गेट नंबर एक पारंपरिक हिमालयन वास्तुकला के डिज़ाइन मे बनाया गया है. इस गेट से एंट्री लेने के बाद कम से कम एक किलोमीटर चलने पर मैं पार्किंग तक पहुँची. अगर आप अपनी गाड़ी से आ रहे हैं तो यहाँ तक कार लाई जा सकती है.यहाँ से सामने मुझे ट्राइबल हेबिटाट दिखाई दे रहा था. 

House from North east estates


House from North east estates




House from North east estates


मैने इन्फर्मेशन सेंटर मे जाकर कुछ पैंफलेट लिए जिससे मुझे यहाँ की कुछ जानकारी मिल जाए. इस पैंफलेट के पीछे यहाँ का मैप भी बना हुआ था,जिससे बड़ी सुविधा हुई. मैने पहले ट्रइबल हेबिटाट देखने का फ़ैसला किया.यह जगह दूर से ही दिल को आकर्षित कर रही थी.ट्राइबल हेबिटाट देश मे पाए जाने वेल सभी जनजातीए आदिवासी लोगों के जीवन की एक झलक प्रस्तुत करने के लिए विकसित किया गया है. यह स्थान थोड़ा उँचाई पर पहाड़ी पर बना है. यह 15 एकड़ के एरिया मे फेला हुआ है. यह पूरा संग्रहालय 200 एकड़ के भू भाग पर फेला हुआ है .जिसे दो भागों में बांटा गया है. एक एक भाग खुले आसमान के नीचे है और दूसरा एक भव्य भवन में। ट्राइबल हेबिटाट खुले भाग में बना है. इस पूरे क्षेत्र में मध्य-भारत की जनजातियों को भी पर्याप्त स्थान मिला है जिनके अनूठे रहन-सहन को यहाँ पर देखा जा सकता है। आदिवासियों के आवासों को उनके बरतन, रसोई, कामकाज के उपकरण अन्न भंडार तथा परिवेश को हस्तशिल्प, देवी देवताओं की मूर्तियों और स्मृति चिन्हों से सजाया गया है। बस्तर दशहरे का रथ भी यहाँ प्रदर्शित है जो आदिवासियों और उनके राजपरिवार की परंपरा का एक भाग है। मैं जैसे-जैसे इस पहाड़ी के शिखर पर पहुँच रही थी..यहाँ पर अनेक आदिवासियों के घर बने हुए थे. उनकी लोक कलाओं से सजे हुए घर और उनकी दीवारों पर उकेरी हुई चत्रकारी.

Tribal wall art@ Tribal Habitat


 इस श्रेत्र को और ज़्यादा गहराई से समझने के लिए, ट्राइबल हेबिटाट के गेट पर ही एक चित्रों से सजी वीथिका है.जिसमे हर चित्र के साथ जानकारी भी दी हुई है. उन चित्रों को देश भर मे घूम घूम कर आदिवासियों के बीच जाकर खींचा गया है और उन्ही आदिवासियों को लाकर यहाँ नए घरों को तैयार करवाया गया है.यह एक लंबी साधना का नतीजा है. सन् 1977 में संस्कृति मंत्रालय के इस उपक्रम की नींव रखी. जिसका उद्देश्य देश की विलुप्तप्राय परन्तु बहुमूल्य सांस्कृतिक परम्पराओं के संरक्षण और पुनर्जीवीकरण को संरक्षण देना था.
मैं घूमते-घूमते श्यामला हिल्स की चोटी पर पहुँच गई हूँ. यहां से बड़े तालाब का मनोरम दृश्‍य दिखाई दे रहा है ।नीचे वन विहार से किसी चीते या तेंदुए के दहाड़ने की आवाज़ आ रही है.

Wall art@Tribal Habitat

Tribal Habitat@

Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya



यहाँ नज़दीक ही एक कैफे भी है जो आगंतुकों को जलपान की सुविधा उपलब्ध करवाता है. मुझे इस पंद्रह एकड़ के ट्राइबल हेबिटाट को देखने मे आधा दिन लग गया.मैने कैफे मे आकर कुछ जलपान ग्राहण किया और अब विथी संकुल का रुख़ किया पर शाम के चार बजने को आए थे। वीथी संकुल देखने के लिए मुझे कल आना होगा। अगले दिन मैंने क्या क्या देखा पढ़े इसके दूसरे भाग में.

कैसे जाएं

वायु मार्ग- भोपाल एयरपोर्ट  सिटी से 12 किमी. की दूरी पर है। दिल्‍ली, मुंबई और इंदौर से यहां के लिए इंडियन एयरलाइन्‍स की नियमित फ्लाइटें हैं। ग्‍वालियर से यहां के लिए सप्‍ताह में चार दिन फ्लाइट्स हैं।

रेल मार्ग- भोपाल का रेलवे स्‍टेशन देश के विविध रेलवे स्‍टेशनों से जुडा हुआ है। यह रेलवे स्‍टेशन दिल्‍ली-चैन्‍नई रूट पर पडता है। शताब्‍दी एक्‍सप्रेस भोपाल को दिल्‍ली से सीधा जोडती है।भोपाल एक्सप्रेस भी दिल्ली से भोपाल जाने के लिए रात भर का समय लेती है. साथ ही यह शहर मुम्‍बई, आगरा, ग्‍वालियर, झांसी, उज्‍जैन आदि शहरों से अनेक रेलगाडियों के माध्‍यम से जुडा हुआ है।

सडक मार्ग- सांची, इंदौर, उज्‍जैन, खजुराहो, पंचमढी, जबलपुर आदि शहरों से आसानी से सडक मार्ग से भोपाल पहुंचा जा सकता है। मध्‍य प्रदेश और पडोसी राज्‍यों के अनेक शहरों से भोपाल के लिए नियमित बसें चलती हैं।

कब जाएं- नवंबर से फरवरी। वैसे भोपाल घूमने के लिए गर्मियों के दो महीने छोड़ कर कभी भी जाया जा सकता है। मानसून के आते ही भोपाल हरयाली से भर जाता है।

फिर मिलेंगे दोस्तों, भारत दर्शन में किसी नए शहर की यात्रा पर,
तब तक खुश रहिये, और घूमते रहिये,

आपकी हमसफ़र आपकी दोस्त


डा० कायनात क़ाज़ी