India's First Hindi Travel Photography Blog: Home

कुछ पंक्तियां इस ब्लॉग के बारे में :

प्रिय पाठक,
हिन्दी के प्रथम ट्रेवल फ़ोटोग्राफ़ी ब्लॉग पर आपका स्वागत है.….
ऐसा नहीं है कि हिन्दी में अच्छे ब्लॉग लिखने वालों की कमी है। हिन्दी में लोग एक से एक बेहतरीन ब्लॉग्स लिख रहे हैं। पर एक चीज़ की कमी अक्सर खलती है। जहां ब्लॉग पर अच्छा कन्टेन्ट है वहां एक अच्छी क्वालिटी की तस्वीर नहीं मिलती और जिन ब्लॉग्स पर अच्छी तस्वीरें होती हैं वहां कन्टेन्ट उतना अच्छा नहीं होता। मैं साहित्यकार के अलावा एक ट्रेवल राइटर और फोटोग्राफर हूँ। मैंने अपने इस ब्लॉग के ज़रिये इस दूरी को पाटने का प्रयास किया है। मेरा यह ब्लॉग हिन्दी का प्रथम ट्रेवल फ़ोटोग्राफ़ी ब्लॉग है। जहाँ आपको मिलेगी भारत के कुछ अनछुए पहलुओं, अनदेखे स्थानों की सविस्तार जानकारी और उन स्थानों से जुड़ी कुछ बेहतरीन तस्वीरें।
उम्मीद है, आप को मेरा यह प्रयास पसंद आएगा। आपकी प्रतिक्रियाओं की मुझे प्रतीक्षा रहेगी।
आपके कमेन्ट मुझे इस ब्लॉग को और बेहतर बनाने की प्रेरणा देंगे।

मंगल मृदुल कामनाओं सहित
आपकी हमसफ़र आपकी दोस्त

डा० कायनात क़ाज़ी
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गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

रंण उत्सव-2016:रंण उत्सव तो एक बहाना है, गुजरात मे बहुत कुछ दिखाना है....

रंण उत्सव-2016

रंण उत्सव तो सिर्फ़ एक बहाना है,  गुजरात मे बहुत कुछ दिखाना है....


यह लाइन किसी ने सही कही है, क्यूंकि रंण उत्सव के बहाने ही मैने बहुत कुछ ऐसा देख डाला जिसे देखने शायद अलग से मैं कभी आती ही नही गुजरात। इस बार मौक़ा था रंण उत्सव मे जाने का। चार दिन की मेरी यह तूफ़ानी यात्रा अपने मे समेटे थी बहुत कुछ अनोखा। अहमदाबाद से सुरेन्द्रनगर, सुरेन्द्रनगर से गाँधी धाम और गाँधी धाम से धोर्ड़ो गाँव जहाँ कि रंण उत्सव मनाया जाता है।  मैं पहले ही बता दूं कि इनमे से कोई भी जगह आस पास नही है लेकिन गुजरात के हाई वे बहुत अच्छे हैं कि आप बिना किसी तकलीफ़ के लंबी रोड यात्रा कर सकते हैं।



चलिए तो फिर यात्रा शुरू करते हैं। मैं अहमदाबाद पहुँच कर निकल पड़ी सुरेन्द्रनगर में वाइल्ड एस सेंचुरी  देखने।  क्या है खास इस सेंचुरी मे? यही सवाल मेरे मन मे भी उठा था।  पाँच हज़ार वर्ग किलोमीटर  मे फैला यह वेटलैंड किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर लेता है।  इसे लिट्ल रंण ऑफ कच्छ कहते हैं।  यह जगह इसलिए मशहूर है कि पूरी दुनिया मे सिर्फ़ यहीं वाइल्ड एस पाए जाते आईं।  वाइल्ड एस यानि कि जंगली गधे। कहते हैं की यहाँ लगभग 3000 वाइल्ड एस हैं। इसके अलावा यहाँ कई अन्य जानवर भी पाए जाते हैं।




मुझे इस जगह की सबसे अच्छी बात यह लगी कि यहां तक पहुँचना बहुत आसान है। मीलों तक फैला वेटलैंड जिसे बड़ी आसानी से जिप्सी मे बैठ कर देखा जा सकता है। सबसे अच्छी बात तो यह है कि यह सेंचुरी बर्ड वाचिंग के लिए बहुत अच्छी है।  मेरी पिछली गुजरात की यात्रा में हम फ्लैमिंगो ढूंढते हुए मांडवी मे कितनी दूर तक समुद्र तट पर चले थे और फिर भी हमे फ्लैमिंगो नही मिले थे लेकिन यहाँ इस सेंचुरी मे जगह जगह वॉटर बॉडी बनी हुई हैं जहां फ्लैमिंगो के झुंड के झुंड देखने को मिल जाते हैं वो भी बड़ी आसानी से। बस ज़रूरत है तो  एक अदद ज़ूम लेंस की, और वो भी कम से कम 400 या 600 mm का ज़ूम लेंस ।




वाइल्ड एस  थोड़े शर्मीले होते हैं अपने नज़दीक गाड़ियों को देख कर झट से झाड़ियों मे घुस जाते हैं। हमे घूमते-घूमते शाम हो गई। सामने सूरज अस्त की ओर चल पड़ा था। यहाँ की दलदली मिट्टी नमक की अधिकता के कारंण बंजर है। लेकिन देखने मे सुंदर लगती है। दूर तक फैला मैदान और सुंदर सनसेट वहीं रुकने को मजबूर कर रहा था। यह दिसंबर का महीना है लेकिन यहाँ ठंड नही है। हवा अच्छी लग रही है। कुछ देर ठहर के सनसेट का मज़ा लिया और फिर चल पड़े अपने डेरे की ओर।

यहीं पास ही एक रिज़ॉर्ट मे ठहरने की ववस्था की गई है। पहला दिन ख़त्म होने को आया। आज चौदहवीं की तो नही लेकिन 12ह्वीं की रात है इसलिए चाँद आसमान मे कुछ ज़्यादा ही चमक रहा है। अभी इसे और चमकना होगा। चाँदनी रात मे रंण के सफेद रेगिस्तान को देखने लोग खास तौर पर पूर्णिमा के दिन आते हैं। यही वहाँ का मुख्य आकर्षण है।

दूसरा दिन थोड़ा लंबा होने वाला था हमे सुरेन्द्र नगर से गाँधी धाम की यात्रा तय करनी है। यह यात्रा कुल 206 किलो मीटर की होने वाली है। रास्ते मे हम कई गाँव देखेंगे। ऐसे गाँव जिनमे छुपा है इतिहास। कच्छ की प्राचीन हस्त कला और वैभव का इतिहास। यहीं पास ही एक गाँव है जिसका नाम है खारा घोड़ा। कहते हैं इस गाँव मे 111 साल पुराना शॉपिंग माल है। जिसे अँग्रेज़ों ने 1905 मे बनवाया था। आज यहाँ कुछ दुकाने मौजूद हैं जोकि गाँव वालों की ज़रूरत का सामान एक ही छत के नीचे उपलब्ध करवाती है। इस गाँव से थोड़ा आगे बढ़ते ही हमे नमक की खेती होते दिखने लगती है। यह पूरा प्रोसेस देखना भी एक अनुभव है। नमक कैसे बनता है इसकी कहानी तफ्सील से जानने के लिए यहाँ क्लिक करें:






अभी तक मुझे गुजरात मे आए हुए 2 दिन हो चुके हैं लेकिन मैने भूंगे नही देखे। भूंगे यानी के मिट्टी के बने गोल घर जोकि कच्छ के ग्रामीण जीवन की पहचान है। मेरी इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य था कि मैं कच्छ मे रहने वाले जनजातीय जीवन को देख पाऊं।  इसीलिए मैने इस बार गाँवों की यात्रा का मन बनाया। मेरा अगला पड़ाव होगा ऐसे ही एक गांव। जहाँ मैं कच्छी कला से जुड़े समुदायों से मिल सकूँ। हम भुज के बहुत नज़दीक हैं और भुज के नज़दीक ही एक गाँव पड़ता है जिसका नाम है सुमरासार शैख़। इस गाँव की एक ख़ासियत है। यहाँ कच्छ मे किए जाने वाली कढ़ाई के काम की सबसे बेहतरीन क़िस्म यहीं देखने को मिलती है। इस गाँव  मे कई NGO और संगठन यहाँ की कला के संरक्षण के लिए काम करते हैं। मैं धूल उड़ाती कच्ची सड़कों को पार करते हुए ऐसी ही एक जगह पहुँच गई हूँ। यह कला रक्षा केंद्र है जहाँ सूफ कला के संरक्षण के लिए कार्य किया जाता है।






यहाँ मिट्टी के गोल घर मुझे आकर्षित करते हैं जिनके बीचों बीच मे एक छोटा-सा आँगन है जहाँ काले लिबास मे कुछ महिलाएँ कढ़ाई का काम कर रही हैं। यह महिलाएँ मारू मेघवाल और रबाड़ी जनजाति से संबंध रखती है और सिंगल धागे से कपड़े पर त्रिकोण आकर की ज्योमित्री डिज़ाइन की कढ़ाई करती हैं। यह बेहद नफीस और बारीक कढ़ाई है। जिसे बड़ी महारत से किया जाता है। कहते हैं इस कला को करने वाले की ऑंखें जल्द ही साथ छोड़ जाती हैं। यह कलाकार कपडे पर उलटी तरफ ताने बानों को उठा कर कढ़ाई करती हैं और सीधी तरफ डिज़ाइन बनती जाती है। इस जनजाति का संबंध पाकिस्तान से है। और यह विस्थापित होकर यहाँ कच्छ मे आ बसे। इनके काम मे महीनो का समय लगता है। लेकिन इनके द्वारा किए गए कढ़ाई के काम की फैशन डिज़ाइनरों मे बड़ी माँग है।


मेरी इस यात्रा में ऐसे ही एक और गांव में मैंने बड़े ही खूबसूरत गोल घर देखे। इस गांव का नाम था - भरिन्डयारी,  कच्छ मे कई प्रकार की कढ़ाई के नमूने देखने को मिलते हैं।  कहते हैं यह कला पाकिस्तान के सिंध प्रांत से कच्छ मे आई और इस सफर में राजस्थानी कला और यहाँ की स्थानीय कला ने इसे और समृद्ध बनाया।  पहले महिलाएँ अपनी बेटियों के शादी के जोड़े खुद तैयार करती थीं। आज यहाँ भाँति-भाँति की कढ़ाइयाँ देखने को मिलती हैं। जैसे खारेक, पाको, राबरी, गारसिया जात और मुतवा।



मुझे सुकून है कि मैं अपनी इस यात्रा मे असली गुजरात को देख पा रही हूँ।  मेरा अगला पड़ाव है होड़का गाँव जोकि धोर्ड़ो के रास्ते मे पड़ता है। इस गाँव की ख़ासियत है यहाँ के गोल घर। मिट्टी की दीवारें और अंदर से बड़े खूबसूरत होते हैं यह घर। आप भी देखिए। एक बार यहाँ आकर यहाँ से वापस जाने का मन नही करेगा। यह लोग अपने घरों को बहुत खूबसूरती से सजाते हैं। घर की दीवारों पर, छत को सब जगह कलाकारी देखने को मिलती है।



क्यूंकि यहाँ की मिट्टी बंजर है इसीलिए शायद यहाँ के लोगों के जीवन मे रंगों का बड़ा महत्व है। इनके कपड़े बड़े कलरफुल होते हैं। रंगीन धागे, शीशा, रंगीन मोती और ऊन के बने यह वस्त्र बहुत आकर्षक हैं। भूंगों मे दिन गुज़ारने के बाद मेरी यात्रा का अंतिम पड़ाव भी आ पहुँचा है। और यह है धोर्ड़ो गाँव जोकि भुज से 80 किलोमीटेर दूर है। यहाँ से सफेद रंण शुरू होता है। यहीं पर हर साल रंण उत्सव मनाया जाता है। देखा जाए तो यहाँ कुछ भी नही है सिवाए मीलों तक फैले सफेद रंण के लेकिन यहाँ रंण उत्सव मानने के लिए पूरा का पूरा टेंट सिटी बसाया जाता है। जोकि किसी स्वप्न लोक जैसा है। ठहरने के लिए वर्ल्ड क्लास टेंट्स लगाए गए हैं और यहाँ शुद्ध गुजराती खाने का प्रबंध किया गया है।



हम दोपहर होते होते धोर्ड़ो पहुँचे। बहुत भूक लगी थी तो सीधे डाइनिंग हॉल मे पहुँच गए। यहाँ का इंतज़ाम बहुत अच्छा है।  सब कुछ पर्फेक्ट। चेक इन से लेकर खाने पीने और रंण मे जाने की व्यवस्था तक सब कुछ पर्फेक्ट।

शाम को रंण उत्सव का शुभारम्भ माननीय मुख्यमंत्री श्री विजय भाई रुपानी के हाथों एक रंगारंग कार्यक्रम के साथ हुआ। हम सब ऊंट गाड़ी पर बैठ कर रंण मे पहुँचे। दूर तक फैला रंण बहुत सुंदर दिखता है। रात मे जब पूर्णिमा का चाँद रोशनी से सारे रंण को जगमगा देगा तब सैलानी इस अद्भुत नज़ारे को देखने रंण मे आएँगे। जिसकी व्यवस्था पहले से ही की गई है।



धवल चाँदनी मे रंण देखना एक अनोखा अनुभव है। मैं कहूँगी कि यह एक ऐसा अनुभव है जिसे सिर्फ़ महसूस ही किया जा सकता है। इसलिए कैमरे मे क़ैद करने के चक्कर मे न पड़ें। बस रण  में जाकर इसका लुत्फ़ उठाएं। ठंडी हवाओं के बीच रंण मे दूर तक सफेद चाँदनी को निहारना बहुत खूबसूरत अनुभव है।



यहाँ टेंट सिटी के पास ही क्राफ्ट बाज़ार है जहाँ कच्छ के हैंडी क्रॅफ्ट आइटम खरीदे जा सकते है। मेरे इस चार दिन के प्रवास मे मैने कच्छी एंबरोएडरी की सैंकड़ों साल पुरानी विरासत को क़रीब से देखा। साथ ही भिन्न-भिन्न प्रकार की जनजातियों के लोगों के जीवन को क़रीब से देखा।

मेरी इस यात्रा का एक और हाईलाइट है और वो है यहाँ का खाना। कहते हैं गुजराती खाना मीठा होता है। पर यह पूरा सच नही है।  यहाँ मीठे के साथ कई अन्य स्वाद भी है, आप ट्राई तो कीजिए।  मैने अपनी पूरी यात्रा मे गुजरात के अलग अलग स्वादों को चखा।  खमंड, धोखला, फाफड, थेपला, गुजराती थाली और भी बहुत कुछ।



गुजरात घूमने कब जाएं?

वैसे तो वर्ष में कभी भी गुजरात घूमने जाया जा सकता है लेकिन रण उत्सव हर वर्ष दिसंबर माह में होता है जोकि फरवरी तक चलता है। अगर आप रंण उत्सव देखने जा रहे हैं तो उद्घाटन के आसपास ही जाएं। फरवरी तक मेले का उत्साह थोड़ा ठंडा हो जाता है।

कैसे पहुंचें?

रंण उत्सव धोरडो नमक गांव में किया जाता है जिसके सबसे नज़दीक भुज(71 किलोमीटर) है। रण उत्सव के लिए आप बाई एयर या ट्रैन से भी जा सकते हैं। नज़दीकी एयरपोर्ट अहमदाबाद है। भुज एयरपोर्ट सबसे नज़दीक है लेकिन फ्लाइट्स बहुत ज़्यादा नहीं हैं, जबकि अहमदाबाद एयरपोर्ट देश के सभी बड़े शहरों से जुड़ा हुआ है। अहमदाबाद से धोरडो की दूरी 370 किलोमीटर है। सड़कें अच्छी हैं लेकिन रास्ता थोड़ा लंबा है।

फिर मिलेंगे दोस्तों, भारत दर्शन में किसी नए शहर की यात्रा पर, तब तक खुश रहिये, और घूमते रहिये,

आपकी हमसफ़र आपकी दोस्त

डा० कायनात क़ाज़ी

गुरुवार, 28 अप्रैल 2016

A day in Himachal heritage village Palampur Himachal Pradesh

एक दिन हिमाचली संस्कृति के नाम... 

Day-1

Himachal heritage village Palampur Himachal Pradesh under full Moon


हिमालय से मेरा लगाव पहले प्यार जैसा है, रह-रह कर पास खींचता है। एक आकर्षण है जो वर्षों से निरंतरता बनाए हुए है। अगर कोई पूछे कि वो कौनसी एक चीज़ है जो मुझे अपने मोहपाश में बांधे रखती है? तो कहना मुश्किल होगा। क्यूंकि कोई एक चीज़ नहीं है जिसका नाम लिया जा सके। मेरे पास तो एक लम्बी फेहरिस्त है, मन को सहलाती हिमालय से आती ठंडी हवाएं, नीला आसमान, हरे पीले भूरे रंगों से सजे वन, सफ़ेद चांदनी का दुशाला लपेटे पहाड़, पहाड़ों पर मीलों फैली सड़कें, उन सड़कों के अन्धे मोड़ों पर बंधी रंगीन पताकाएं फ़िज़ा में बौद्ध श्लोकों को घोलती, सबकी सलामती की दुआ करती, पगडंडियों पर दौड़ती भेड़ें और उनके मुस्तैद शिकारी कुत्ते, कोयल की कूक, मोर की बांग, भोर का उजाला, चाय का प्याला, आधी रात का पूरा चाँद, पाईन की महक, नदी की कल-कल, चमकीली धूप, लाल टीन की छतें, सुरमई पत्तरों वाली झोंपड़ियां, जंगली गुलाब की झाड़ियां और उन पर भर-भर आते सजीले फूल, झरने और नाले, मंदिर की घंटियां और मॉनेस्ट्री से आते नम मयो हो रेंगे क्यों की गूंज, फसलों से लहलहाते खेत, खेतों में काम करते लोग, पहाड़ी गोल मटोल बच्चे, पोपले बुज़ुर्ग, कश्मीरी सेब से लाल रुखसारों वाली महिलाऐं और न जाने क्या क्या….देखा बह गई न हिमालय के मोहपाश  में, चलिए चलते हैं एक नई यात्रा पर।

Himachal heritage village Palampur Himachal Pradesh under full Moon

इस दफा पुकार हिमालय के खूबसूरत क्षेत्र-धौलाधार पर्वत श्रृंखला से आईहिमाचल का यह भाग कांगड़ा में पड़ता है। दोस्तों हम पिछली बार ब्यास सिर्किट घूम कर आए थे इस बार हम धौलाधार सर्किट देखेंगे।( ब्यास सिर्किट की पोस्ट देखने के लिए यहाँ क्लिक करें।) धौलाधार सर्किट का एक बेहतरीन शहर है पालमपुर। काँगड़ा वैली में बसा यह शहर अपने में समेटे हुए है, बर्फ से ढ़के पहाड़ जोकि धौलाधार पर्वत श्रृंखला का हिस्सा हैं, बैजनाथ मंदिर, पैराग्लाइडिंग के लिए पूरी दुनियां में मशहूर बीड़ बिलिंग, चाय के बागान और कांगड़ा वैली में चलने वाली टॉय ट्रैन। पालमपुर के नज़दीक ही कई जगहें हैं जहाँ जाया जा सकता है। कुल मिला कर एक लॉन्ग वीकएंड का एक्शन पैक्ड इन्तिज़ाम।

Himachal heritage village Palampur Himachal Pradesh under full Moon

पालमपुर अच्छी तरह देखने के लिए काम से काम 2 से 3 दिन का समय होना चाहिए। दिल्ली से पालमपुर लगभग 530 किलो मीटर पड़ता है। जिसका रूट यह रहेगा:-

दिल्ली-सोनीपत-पानीपत-करनाल-कुरुक्षेत्र-अम्बाला-रूपनगर-कीरतपुरसाहिब-आनंदपुर साहिब-नंगल-ऊना-रानीताल-काँगड़ा-पालमपुर।

अगर आप अपनी कार से जाएंगे तो यह यात्रा 12-13 घंटे में पूरी होती है। पालमपुर पहुँचने के लिए सबसे अच्छा साधन है, हिमाचल परिवाहन की वोल्वो बसें। यह दिल्ली कश्मीरी गेट से चलती हैं और सीधा पालमपुर उतारती हैं। वैसे तो यह बसें दिन में कई समयों पर चलती हैं पर रात की वोल्वो सबसे अच्छी रहती है, सुबह-सुबह पालमपुर पहुंचा देती हैं।

Himachal heritage village Palampur Himachal Pradesh in the morning

वैसे तो पालमपुर के नज़दीक इतना कुछ है देखने को पर मैंने पालमपुर से थोड़ा-सा दूर एक हिमाचल हैरिटेज विलेज है वहीँ ठहरने का मन बनाया। मैं हमेशा से हिमालय में रहने वाले लोगों के जीवन को नज़दीक से देखना चाहती थी। जब कभी मैं हिमाचल में रोड ट्रिप किया करती थी और थोड़ी-थोड़ी दूरी पर पड़ने वाले गांवों को देखती तो उनके घर मुझे बहुत आकर्षित करते। मैं हमेशा सोचती कि काश मैं इन घरों में कुछ दिन रह कर देख सकती उनके रेहन-सहन, संस्कृति को करीब से देख पाती, अनुभव कर पाती। पर इतने सालों में यह संभव न हो सका।

Himachal heritage village Palampur Himachal Pradesh under interiours

 फिर मुझे हिमाचल हैरिटेज विलेज के बारे में एक ख़ास दोस्त ने बताया। एक दिन बातों-बातों में हिमालय का ज़िक्र निकला तो बात चलते-चलते दूर हिमाचल हैरिटेज विलेज तक जा पहुंची। मेरे दोस्त ने बताया कि मैं सच में हिमाचल के अलग-अलग रीजन को एक ही जगह देख सकती हूं और अनुभव भी कर सकती हूं। मुझे विश्वास न हुआ। यह मुझे वहां पहुँच कर पता चला।

Himachal heritage village Palampur Himachal Pradesh under full Moon

 हिमाचल हैरिटेज विलेज एक ऐसी जगह है जिसे बड़े प्यार से हिमाचल की संस्कृति को प्रोमोट करने के लिए बनाया गया है। यहाँ चार कॉटेज हैं जिनके नाम हिमाचल के अलग-अलग गांवों के नामों पर रखे गए हैं जैसे बरोट, ऊना, काँगड़ा, धलियारा, खनियारा। और ख़ास बात यह है कि इन्हें बनाया भी उसी तरह गया है जैसे घर इन गांवों में होते हैं। बस फ़र्क़ है तो लग्ज़री का।

Himachal heritage village Palampur Himachal Pradesh 


यह एक लग्ज़री रिसोर्ट है जहाँ आपकी सुख-सुविधाओं का खास ख्याल रखा गया है। हिमाचल हैरिटेज विलेज की लोकेशन इस जगह की ख़ासियत है। पहाड़ के दामन में बना यह रिसोर्ट चांदनी रात में बहुत सुन्दर दीखता है। पीछे बर्फ से ढंके धौलाधार पर्वत श्रृंखला, दूर तक फैले पाईंन के जंगलदाईं और बहती पहाड़ी नदी, रिसोर्ट के बीच से निरंतर बहते पहाड़ी पानी के सोते, इस जगह को निरंतरता प्रदान करते हैं। यहाँ पहुँच कर कहीं जाने का मन नहीं करता।



 दिल करता है कि यहीं बैठ कर पूरा जीवन बिता दिया जाए। दिन में खिली धूप रहती है और रात में काफी ठण्ड हो जाती है। यह जगह दिल्ली से थोड़ा दूर ज़रूर है पर यहाँ पहुँच कर लगता कि इतनी दूर आना बेकार नहीं गया। हिमाचल हैरिटेज विलेज पहुँच कर सारी थकन मिट जाती है। रिसोर्ट के मालिक डोगरा जी व गगन शर्मा एक बेहतरीन होस्ट हैं। और मेहमान नवाज़ी में कोई कसर बाक़ी नहीं रखते। फिर चाहे वह हिमाचल का परम्परागत भोजन काँगड़ा धाम हो या फिर बॉन फायर का इन्तिज़ाम। ज़मीन पर बैठ कर पत्तल दावत ने समां ही बांध दिया। मुझे अपने बचपन की यादें ताज़ा हो आईं। 

Kangda Dham-Himachal heritage village Palampur Himachal Pradesh 

  हमने पहले दिन सिर्फ़ रिसोर्ट में रह कर थकान उतारी और बॉन फायर का मज़ा लिया। हम देर रात तक नीले आकाश तले इस हसीन वादियों का आंनद ले रहे थे। रात नर्म बिस्तर पर नींद बहुत अच्छी आई। सुबह मेरी आँख पक्षियों के कलरव से खुली। कैसी प्यारी सुबह थी। भोर का नीला-नीला उजाला और कोयल की मीठी कूक। यह यहीं हो सकता है। हरी भरी वादी में सूरज की रौशनी पाईंन के जंगलों से छन कर आने लगी।

Himachal heritage village Palampur Himachal Pradesh in the morning

 मैंने आलस छोड़ कर गरमा-गरम चाय का प्याला थाम लिया। आज बहुत कुछ देखना है। बैजनाथ मंदिर की सैर, पैराग्लाइडिंगबीड़ बिलिंग, चाय के बागान और कांगड़ा वैली में चलने वाली टॉय ट्रैन। यह था ब्यौरा पहले दिन का, अभी बहुत कुछ बाक़ी है। आप ऐसे ही बने रहिये मेरे साथ। पालमपुर डायरी के पन्नों से कुछ और क़िस्से आपके साथ साझा करुँगी अगली पोस्ट में।

तब तक खुश रहिये और घूमते रहिये

आपकी हमसफ़र आपकी दोस्त


डा० कायनात क़ाज़ी

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2015

हिमालय की पुकार…इस बार कश्मीर

हिमालय की पुकारइस बार कश्मीर




पूरे हिमालय मे एक तिलिस्म है जो मुझे अपनी ओर खींचता रहता है. अभी हिमाचल की यात्रा को कुछ ज़्यादा दिन भी नही गुज़रे हैं कि कश्मीर की यात्रा का विधान बन गया है. जबकि मैने पूरी कोशिश की थी कि बीच में एक बार दक्षिण भारत का एक चक्कर लगा कर आऊंगी पर ऐसा हो ना सका. और एक बार फिर मैं हिमालय की खूबसूरती से रूबरू होने निकल पड़ी हूं कश्मीर की वादियों मे.
यह टूर लगभग दस दिन का टूर रहेगा.जिसमें मैने बहुत सारी जगहों को देखने का नही सोचा है. इस बार मैं जहां भी जाऊंगी सुकून से वक़्त गुज़ारुंगी, और तब तक उस जगह को नही छोड़ूंगी जब तक मेरा दिल नही भर जाता. मेरी इस यात्रा मे शामिल हैं यह जगहें:
1. श्रीनगर
2. पहलगाम
3. ऐपल वैली
4. अवन्तीपुरा मंदिर अवशेष
5. अरू वैली
6. लिद्दर वैली
7. मार्कंडे मंदिर, मट्टन, अनंतनाग
8. तांगमर्ग
9. गुलमर्ग
हमेशा की तरह मैं अपने कंप्यूटर पर बैठ कर जितनी रिसर्च कर सकती थी वो सब की. किसी जगह पर जाने से पहले वर्चूअली पहुंचने के लिए इंटरनेट बड़ा ही आसान तरीका है. मैं कोशिश करती हूँ कि उस जगह से जुड़ी ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी जुटा लूं ताकि कोई असुविधा ना हो, और फिर कश्मीर जाने को लेकर थोड़ी सतर्कता भी ज़रूरी है. मुझसे पहले गए हुए लोगों के रिव्यूज़ और मशवरे मेरे बड़े काम आते हैं. वैसे तो मैं किसी एक ब्लॉगर को फॉलो नही करती पर बहुत सारे ब्लॉगरस के आर्टिकल और रिव्यू पढ़ती हूँइन सब से बड़ी मदद मिलती हैमेरी आइटिनरी पूरी तैयार है. बस यह तय नही किया है कि मैं किस जगह पर कितने दिन रुकने वाली हूं..ऐसा शायद मैने पहली बार किया है कि अपनी आइटिनरी को इतना लूज़ रखा है..शायद खुद पर एतमाद बढ़ने की वजह से ऐसा कर पाई हूं..कहते हैं बंधनों के कुछ सिरे खुले भी छोड़ने चाहिए..थोड़ी ताज़ी हवा आती जाती रहती है..जिस तरह इश्क़ के अलग-अलग लेवल्ज़ होते हैं शायद ट्रेवलिंग के भी अलग-अलग लेवल होते हैं..पहले आप ट्रेवल करने के ख्वाब भर देखते हैं और सोचा करते हैं कि एक दिन मैं वहां जाऊंगा,ऐसा करूंगा वैसा करूंगाकुछ साल शायद आप ऐसे ही ख़्यालों मे निकाल देते हैं. मैनें भी अपनी ज़िंदगी के शुरुवाती 20 साल ऐसे ही सपने संजोने में निकाले हैं, और उन बीस सालों के अगले पांच साल खुद के ट्रेवलर बनने की प्लॅनिंग मे निकाले हैं, और उन पांच सालों के अगले कुछ साल मैने ट्रेवल शुरू करने और ग्रुप मे ट्रॅवेल करने मे निकाले हैं.मुझे लगता है कि यह अलग अलग मुक़ाम हैं ट्रॅवेल के, जिनहें शायद सबको ही तय करना पड़ता होगाअब हर कोई तो इबने बतुता नही हो सकता जो पच्चीस साल की उम्र मे ही दुनिया देखने निकल पड़ा था और अगले पच्चीस बरस तक घर वापस नही लौटा था
जैसे इश्क़ के सात मुकाम होते हैं, दिलकशी,ऊन्स, मुहब्बत,अक़ीदत, इबादत,जुनून और मौत. वैसे ही ट्रेवल के भी सात मुक़ाम होते हैं. जिस तरह मुझे ट्रेवल और फोटोग्राफी से लगाव है मुझे लगता है कि इश्क़ के यह सात मुक़ाम मेरे लिए ट्रेवल और फोटोग्राफी से इश्क़ के सात मुक़ाम बन गए हैं।

ट्रेवल और फोटोग्राफी से इश्क़ के सात मुकाम
1.             दिलकशी- आकर्षण attraction
2.             ऊन्स- infatuation
3.             मुहब्बत-लव love
4.             अक़ीदत- credence
5.             इबादत- worship
6.             जुनून- obsession
7.             मौत- death
शायद मैं अभी तीसरे मुक़ाम पर हूं. ट्रेवल मे दिलकशी थी इसीलिए बचपन से ही इसके बारे मे सोचा करती थी. जब फिल्में देखती थी और कोई नज़ारा मुझे अच्छा लगता तो दिल करता की उड़ कर वहां पहुंच जाऊं...शायद सभी का दिल यही करता होगा पर मैं इसके अलावा एक बात और सोचा करती थी उस नज़ारे को देख करजहां एक तरफ उस दिलफ़रेब खूबसूरती मुझे अपनी ओर आकर्षित करती थी वहीं दूसरी ओर मैं सोचती कि यह तस्वीर क्लिक कहां खड़े हो कर की गई होगी? उस वक़्त कैमरामैन कहां होगा? जितना लुभावना वो मंज़र होता था उसे ज़्यादा दिलफ़रेब यह अहसास होता था कि काश मैं भी ऐसी तस्वीरें खींच पाऊंऔर आज मैं बिल्कुल वैसा ही कर पाती हूं जैसा की कभी सोचा करती थी दिलकशी और उन्स के दोनों मुक़ाम पार कर चुकी हूं और अब मुहब्बत के मुक़ाम पर हूं। मुझे मुहब्बत है फोटोग्राफी और ट्रेवल दोनों से। देखा जाए तो मैं इन दोनों को एक दूसरे से अलग मानती भी नहीं।

कश्मीर जाने से पहले मुझे कई लोगों ने माना किया कि वहां ना जाया जाए पर मेरा दिल ना माना. हमारे देश मे ऐसा कौनसा हिस्सा हो सकता है जहां जाया ना जा सके? और फिर भय तो वैसे भी मुझे छू कर भी नही गया है. मेरे कुछ कश्मीरी दोस्त और जाननेवाले हैं मैंने एक बार उनसे फोन करके हालत का जायज़ा लिया. सभी ने मुझे एक ही बात कही कि आप आराम से आ सकती हैं. कोई परेशानी नही है वादी मे .मैनें भी अल्लाह का नाम लिया और चल दिए श्रीनगर. हमारी फ्लाइट ने दोपहर को श्रीनगर एयरपोर्ट पर लैंड किया. एयरपोर्ट की बेनूरी ने हमारा स्वागत कियायह एयरपोर्ट एयरपोर्ट कम और मिलिटरी बेस ज़्यादा लग रहा था. मैने टूरिस्ट इन्फर्मेशन डेस्क से जाकर कुछ जम्मू कश्मीर टूरिज़्म के पैम्फलेट लिए, पर यह डेस्क भी बदइंतज़ामी का शिकार थी. वहां पर टूरिस्ट मैप नही था और ना ही और बुकलेट्स..जोकि आम तौर पर टूरिस्ट्स के काम की जानकारियां समैटे होती है. मुझे समझ नही आता कि राज्य सरकारें टूरिज़्म के नाम पर हर साल एक नया चमचमाता विज्ञापन तो टीवी पर दिखा लोगों को अपने प्रदेश घूमने आने की दावत तो बड़ी शान से देती हैं पर ग्राउंड ज़ीरो पर तैयारी क्यूं नही करती हैं? मैने सिर्फ़ एक रात के लिए होटल बुक किया हुआ था. बाक़ी दिनों के लिए कुछ पहले से बुक नही किया था. मैने एयरपोर्ट से बाहर निकल कर प्रीपेड टेक्सी बुक की और निकल पड़ी श्रीनगर की तरफ. एयरपोर्ट से मेरा होटल जोकि डल झील के पास बुलवार्ड रोड पर ही है, जिस की दूरी एयरपोर्ट से लगभग 17 किमी थी. हमने 45 मिनट मे यह दूरी तय की. होटल मे चेक इन किया और अपनी पहली शिकारा राइड के लिए डल झील की तरफ चल दिए.
आगे क्या हुआ ?
इंतिज़ार कीजिये अगली पोस्ट का। 
तब तक के लिए, घूमते रहिये और खुश रहिये। 

आपकी हमसफ़र आपकी दोस्त 
डा ० कायनात क़ाज़ी