India's First Hindi Travel Photography Blog: Home

कुछ पंक्तियां इस ब्लॉग के बारे में :

प्रिय पाठक,
हिन्दी के प्रथम ट्रेवल फ़ोटोग्राफ़ी ब्लॉग पर आपका स्वागत है.….
ऐसा नहीं है कि हिन्दी में अच्छे ब्लॉग लिखने वालों की कमी है। हिन्दी में लोग एक से एक बेहतरीन ब्लॉग्स लिख रहे हैं। पर एक चीज़ की कमी अक्सर खलती है। जहां ब्लॉग पर अच्छा कन्टेन्ट है वहां एक अच्छी क्वालिटी की तस्वीर नहीं मिलती और जिन ब्लॉग्स पर अच्छी तस्वीरें होती हैं वहां कन्टेन्ट उतना अच्छा नहीं होता। मैं साहित्यकार के अलावा एक ट्रेवल राइटर और फोटोग्राफर हूँ। मैंने अपने इस ब्लॉग के ज़रिये इस दूरी को पाटने का प्रयास किया है। मेरा यह ब्लॉग हिन्दी का प्रथम ट्रेवल फ़ोटोग्राफ़ी ब्लॉग है। जहाँ आपको मिलेगी भारत के कुछ अनछुए पहलुओं, अनदेखे स्थानों की सविस्तार जानकारी और उन स्थानों से जुड़ी कुछ बेहतरीन तस्वीरें।
उम्मीद है, आप को मेरा यह प्रयास पसंद आएगा। आपकी प्रतिक्रियाओं की मुझे प्रतीक्षा रहेगी।
आपके कमेन्ट मुझे इस ब्लॉग को और बेहतर बनाने की प्रेरणा देंगे।

मंगल मृदुल कामनाओं सहित
आपकी हमसफ़र आपकी दोस्त

डा० कायनात क़ाज़ी
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बुधवार, 23 सितंबर 2015

दा ग्रेट हिमालय कॉलिंग...दसवां दिन-कसौली

दा ग्रेट हिमालय कॉलिंग...दसवां दिन-कसौली
The Great Himalayas Calling...
Day-10











इस सीरीज़ की पिछली पोस्ट देखने के लिए यहां क्लिक करें: दा ग्रेट हिमालयकॉलिंग.... नवां दिन सोलांग वैली

सोलांग वैली से लौट कर हमने पीरपंजाल कॉटेज में आराम करने का फैसला किया। हमारी यात्रा अब समाप्ति की ओर है। लेकिन इस यात्रा का एक पड़ाव अभी बाक़ी है। हमने लौटे हुए कसौली जाने का तय किया और एक रात कसौली में ही गुज़ारने की सोची। ऐसा बहुत काम लोग जानते होंगे की कसौली का नाम एक फूल के नाम पर पड़ा है। इस वैली में पाया जाने वाला एक फूल "कसूल" इसी पर यहां का नाम कसौली पड़ा। कसौली का नाम लेते ही दिमाग में कोलोनियल स्टाइल की पुरानी इमारतें और एक शांत हिल टाउन की तस्वीरें आ जाती हैं। आखिर कसौली क्यों है हज़ारों लोगों की पसंद?


समुद्र तल से 5600 फिट की ऊंचाई पर बसा एक शांत नगर कसौली, इतना छोटा होते हुए भी सैलानियों को अपनी ओर खींचता रहा है। इसके कई कारण हैं। एक यह चंडीगढ़ से सिर्फ 58 किमी दूर है। दूसरा यह ऊंचाई पर बसे होने के कारण वर्ष भर हरा भरा रहता है। शायद इसीलिए इस जगह को अंग्रेज़ों ने पसंद किया होगा। और शायद इसीलिए यह यहां पर कई फिल्मों की शूटिंग हुई है। मनीषा कोइराला और अनिल कपूर की फिल्म 1947 ए लव स्टोरी यहीं फिल्माई गई थी। प्रसिद्ध लेखक रस्किन बांड का जन्म भी कसौली में ही हुआ था। इस छोटे से टाउन को अंग्रेज़ों ने छावनी के रूप में विकसित किया था। फेमस सनावर स्कूल यहां से बहुत नज़दीक है। कसौली तक पहुँचने का रास्ता पहाड़ी उत्तर चढाव से भरा हुआ है।



 लेकिन पाइन के पेड़ों से आती फूलों की ताज़ी महक आपको रास्ते की थकान महसूस नहीं होने देगी। कसौली शहर में घुसते ही हमें एक छोटा सा बाजार दिखा और उससे थोड़ा ऊपर मॉल रोड। यह मॉल रोड शिमला या नैनीताल के मॉल रोड जितना बड़ा बाजार तो नहीं पर एक छोटा सा बाजार यहां भी है। माल रोड से बाईं तरफ चर्च की बिल्डिंग थी। इस चर्च का नाम क्राइस्ट चर्च है। इस चर्च का निर्माण अंग्रेज़ों ने करवाया था। यह एक खूबसूरत ईमारत है। मैंने चर्च को अंदर जाकर देखना चाहा पर चर्च दोपहर को 12 बजे से पहले नहीं खुलता है। मुझे इसके लिए इन्तिज़ार करना होगा। 12 बजे के बाद मुझे चर्च को अंदर से देखने का मौक़ा मिला। यहाँ बहुत शांति थी।




 कसौली में देखने के लिए कई पॉइंट्स हैं जैसे मंकी पॉइंट। यह जगह सैलानियों को बहुत भाती है। मंकी पॉइंट एयरफोर्स स्टेशन में बना हुआ है। जिसके लिए घूम कर जाना होता है। इस पॉइंट का नाम मंकी पॉइंट कैसे पड़ा इसके पीछे भी एक रोचक कहानी मशहूर है। कहते हैं की जब हनुमान जी हिमालय पर्वत से संजीवनी बूटी लेकर लौट रहे थे तब उन्होंने इस स्थान को अपने पैर से छुआ था इसीलिए यहाँ का नाम मंकी पॉइंट पड़  गया है। मंकी पॉइंट से घाटी बहुत सुन्दर दिखती है। कसौली में एक दुर्गा माता का मंदिर भी है। कसौली में आप ट्रैकिंग भी कर सकते हैं। यहां लोग पाइन  फोरेस्ट में ट्रेक्किंग करना बहुत पसंद करते हैं। 


अगर आप कसौली आराम करने और प्राकृतिक सुंदरता को शांति में महसूस करना चाहते हैं तो कसौली ज़रूर जाएं यह एक सुकून भरा टाउन है. यहां ठहरने के लिए कई होटल भी हैं। यहाँ के आसपास के गांवों में बड़ी ही सुन्दर कॉटेज दिखाई देती हैं। यहां भी ठहरने  की व्यवस्था की जा सकती है। कसौली में ऐसी ही एक कॉटेज में रुक कर मैंने एकांत की शांति और मीलों दूर तक फैले पहाड़ों की परतों को देखते हुए शाम गुज़ार दी। अगले दिन हमें निकलना होगा। वापस अपनी रूटीन जिंदिगी में जाना होगा।




ब्यास सर्किट की मेरी यह यात्रा कसौली पर आकर समाप्त होती है। हिमालय को देखने का मेरा यह जूनून ज़्यादा दिन तक शांत नहीं रह पाएगा और फिर निकल पड़ेगा हिमालय के कुछ और नए अनछुए पहलुओं से रूबरू होने। हमारे शास्त्रों में हिमालय को स्वर्ग का दर्जा ऐसे ही नहीं दिया गया है। यह स्वर्ग है धरती पर।




गुरुवार, 10 सितंबर 2015

दा ग्रेट हिमालय कॉलिंग... आठवां दिन मनाली

दा ग्रेट हिमालय कॉलिंग... आठवां दिन मनाली

The Great Himalayas Calling...
Day-08

Beas River@ Manali


नग्गर के ऐतिहासिक मुरलीधर का मंदिर देखने के बाद हमें आगे बढ़ना होगा। मुसाफिर के लिए आगे बढ़ना ही ज़िन्दगी है। यह जगह इतनी ख़ूबसूरत है कि इसे छोड़ कर जाने का मन तो नहीं है पर जाना तो होगा ही। मैंने भारी मन से सामान बांधा और एक नज़र नग्गर कैसल के विशाल अहाते को देखा। सामने मनाली को जाने वाला रास्ता गाड़ियों की छोटी छोटी हेड लाइटों से जगमगा रहा था। यह जगह सामरिक महत्व से बहुत मुनासिब है यहां से बैठ कर पूरी कुल्लू वैली पर नज़र रखी जा सकती है। शायद इसी लिए नग्गर के राजा ने अपना दुर्ग बनाने के लिए इस स्थान का चुनाव किया होगा। नग्गर केसल के रस्टोरेंट का एक हिस्सा वैली के ऊपर बने दालानों में बना है। जहां खूबसूरत झरोखे बनाए गए हैं। हमने यहां बैठ कर अपना नाश्ता ख़त्म किया। होटल के एक स्टाफ ने नीचे इशारा करते हुए हमें एक घर दिखाया और बताया कि प्रियंका चौपड़ा की फिल्म मैरीकोम की शूटिंग इसी घर में हुई थी। हमने नग्गर कैसल को अलविदा कहा और निकल पड़े मनाली की ओर। महान हिमालय में बसे यह शांत गांव आपको वापस नहीं आने देते। दिल करता है कि कुछ दिन और गुज़ार लें। इतनी शुद्ध और ताज़ी हवा हम बड़े शहरों में रहने वालों को कहां नसीब होती है।


Beas River on the way to Manali

मेरी इस पूरी यात्रा में ब्यास नदी मेरी साथी रही है। कभी मेरे दाईं  ओर तो कभी मेरे बाईं ओर। दूध की सफ़ेद धार सा निर्मल जल जाने कितनों की प्यास बुझाता होगा। रिवर राफ्टिंग के शौकीनों के लिए यह जगह स्वर्ग जैसी है। मनाली के रास्ते में कई सारे पॉइंट्स हैं जहां से रिवर राफ्टिंग की जा सकती है। 


River rafting in Beas river

एक बार फिर हम पहाड़ों की पतली सडकों पर थे जो किसी हसीना की कमर पर झूलती कंधोनी की तरह पहाड़ों से लिपटी हुई मनाली की ओर आगे बढ़ रही थी। नग्गर से मनाली लगभग 18 किलोमीटर दूर है। यहां तक का हमारा सफर बेहद सुकून भरा और मन को शांत करने वाला था। यहां शोर तो था पर एकदम अलग क़िस्म का, चिड़ियों की चहचहाट का शोर, बड़े-बड़े पत्थरों पर नदी की तेज़ धार के टकराना का शोर, हवा के झोकों कर झूलते पाइन की कोमल कलियों का आपस में टकराने का शोर। इस घने जंगल में पेड़ों के झुरमुट से आती झींगरों की आवाज़ों का शोर, दूर गांव में किसी के लकड़ियां काटने का शोर, सड़क के बीचों बीच धान की घांस सुखाती पहाड़नों की खिलखिलाहट का शोर, किसी झोंपड़ी में शांत दोपहर में याक की ऊन से हथकरघे पर शॉल बुनने की खड़-खड़ का शोर। गांव की चौपाल पर बैठे पहाड़ी बुज़ुर्गों के हुक्के की गुड़गुड़ का शोर। पहाड़ी सड़क के अंधे ख़तरनाक मोड़ पर सामने से आती गाड़ी के हॉर्न से आता, एकांत की नीरवता को भंग करता शोर। हमारी दुनियां के शोर से बिलकुल जुदा और कानों को भला लगने वाला। 


The Dhauladhar range


लेकिन मनाली पहुंचते पहुंचते मेरा यह सुन्दर सपना डीज़ल की गाड़ियों से निकलते प्रदूषण और लगातार बजते हॉर्न से आते शोर से टूट गया। मेरी एक सलाह है, अगर आप हिमालय की यात्रा प्राकृतिक सुंदरता और शांति के लिए करना चाहते हैं तो हिमालय के अंदरुनी हिस्सों में जाएं। मनाली इतना ज़्यादा टूरिस्ट एरिआ बन चुका है कि अपनी सुंदरता ही खो बैठा है। मनाली शुरू होते ही जगह जगह कुकुरमुत्ते से उग आए होटल पहाड़ों की क़ुदरती खूबसूरती को निगलते से जान पड़ते हैं। इतनी शांत जगह से होकर आते हुए मेरे लिए मनाली में रुकना बहुत मुश्किल था। 


KK@Vashishth


शुक्र है हमने अपने ठहरने की व्यवस्था मनाली से बाहर वशिष्ठ में की थी। यह मनाली से थोड़ा आगे पड़ता है और मनाली की भीड़ और आपाधापी से बचा हुआ है। वशिष्ट मनाली से मात्र तीन किलोमीटर आगे लेह मनाली हाइवे पर दाईं ओर थोड़ा ऊपर जाकर पड़ता है। जिसके बाईं ओर ब्यास नदी बहती है और उसके पीछे विशाल पीर पंजाल पर्वत श्रंखला क़तार में खड़ी है।


on the way to Manali-wooden carving work on the gate of a temple

 यहां प्रसिद्ध ऋषि वशिष्ठ का मंदिर है और कुदरती गर्म पानी के सोते भी है। यह जगह ट्रैवलर्स के बीच काफी पसंद की जाती है। यहां मनाली की भीड़ न होकर शांत वातावरण है। पहाड़ी पठार पर बसा वशिष्ठ गांव आज देसी विदेशी ट्रैवलर्स के ठहरने की पहली पसंद है। यहां कई अच्छे कैफे और रेस्टॉरेन्ट बने हुए हैं। हमने यहां पीरपंजाल कॉटेज में स्टे किया। यह एक कोलोनियल लुक वाली दो मंज़िला कॉटेज थी ,जोकि सेब के बागान के बीच बनी हुई थी। हमारी होस्ट दो नौजवान लड़कियां थीं। जिनमे से एक देहरादून और दूसरी पुणे की थी और आजकल टेंपरेरी तौर पर इस कॉटेज के मैनेजर कम कयर टेकर की जॉब कर रही थी।


Girls playing in the campus of the temple


हमने फ्रेश होकर मनाली घूमने का प्लान बनाया। मनाली सिटी में एक मंदिर है जिसे देखने लगभग सभी जाते हैं-हिडिम्बा देवी टैम्पल। हमने भी यहीं से शुरुआत की।
यह मंदिर मनाली के पास ढूंगरी नामक स्थान पर पाइन के जंगलों में एक ऊंचे शिखर पर बना हुआ है। कहा जाता है कि यह मंदिर हिडिम्बा देवी को समर्पित है। हिडिम्बा देवी का सम्बन्ध महाभारत के भीम से जुड़ा हुआ है। यहां के लोग इस से जुड़ी बड़ी रोचक कहानी सुनाते हैं। लीजिये आप भी सुनिए।


Hidimba devi temple


महाभारत काल में जब पांडव वनवास का समय जंगल में गुज़ार रहे थे, तब पांडवों का घर जला दिया गया था, पांडवों ने वहां से भाग कर एक दूसरे वन में शरण ली थी। जहाँ पीली आँखों वाला हिडिंब राक्षस अपनी बहन हिंडिबा के साथ रहता था। एक दिन हिडिंब ने अपनी बहन हिंडिबा से वन में भोजन की तलाश करने के लिये भेजा परन्तु वहां हिंडिबा ने पाँचों पाण्डवों सहित उनकी माता कुन्ति को देखा। इस राक्षसी का भीम को देखते ही उससे प्रेम हो गया, हिडिम्बा भीम के बल और शक्तिशाली शरीर को देख कर उस पर मोहित हो गई और उसने एक सुन्दर रूपवती का भेस बना कर भीम को सब सच बता दिया। हिडिम्बा ने अपने भाई से पांडवों की रक्षा की और भीम को अपने भाई से युद्ध करने में मदद की जिससे खुश होकर वहाँ जंगल में ही कुंती की आज्ञा से हिंडिबा एवं भीम दोनों का विवाह हुआ। यह मंदिर उन्हीं देवी हिडिम्बा को समर्पित है। वैसे तो यह मंदिर अति प्राचीन है पर इसका पैगोडा शैली में निर्माण महाराजा बहादुर सिंह ने 15वीं शताब्दी में करवाया। उन्होंने ही नग्गर के त्रिपुरा सुंदरी मंदिर का भी निर्माण करवाया था इसी लिए देखने में यह दोनों मंदिर एक जैसे दिखाई देते हैं।
इस मंदिर तक जाने के दो रास्ते हैं। हमारा ड्राइवर हमें उत्तरी द्वार से मंदिर की सीढ़ियों तक लेकर गया। अगर आप मुख्य द्वार से आएंगे तो आपको ज़्यादा चलना पड़ेगा। उत्तरी द्वार कॉलोनी से होकर गुज़रता है। पाइन के ऊंचे-ऊंचे पेड़ों के बीच लकड़ी और पत्थर से बना यह मंदिर पर्यटकों से भरा हुआ था। यहां के स्थानीय लोगों में इस जगह की विशेष मान्यता है। इस मंदिर का एक और नाम भी है-धूंगरी मंदिर। यह पूरा का पूरा मंदिर लकड़ी का बना है इसकी छत भी लकड़ी से ही बनाई गई है। दीवारें भी लकड़ी की ही है जिनपर नक्कशी से देवी-देवताओं के जीवन की एक झलक दिखाई गई है, मंदिर के भीतर महिषासुर मर्दिनी की मूर्ति है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर लकड़ी पर कुल्लू रियासत के तत्कालीन राजा बहादुर सिंह का नाम और निर्माण तिथि संवत् 1436 अंकित है।
इस मंदिर की ऊंचाई 40 मीटर है। इसका आकार कोन(शंकु) जैसा है। पैगोडा शैली के इस मंदिर की विशेषता यह है कि इसके चार छतें हैं। ऊपर तीन छतें वर्गाकार हैं और चौथी छत कोन(शंकु) आकर की है जिस पर चारों ओर पीतल लगा है। नीचे से ऊपर की ओर हर छत क्रमश: छोटी होती जाती है और शीर्ष तक पहुँच कर कलश का आकार ले लेती है.


KK@Hidimba devi temple


हम मंदिर प्रांगण में खड़े इस विशाल और ऐतिहासिक मंदिर को देख रहे थे, मंदिर से लगे हुए ही पुष्प वाटिका है। हमने मंदिर को अंदर से देखने का फैसला किया। इस मंदिर में, हिडिम्बा देवी के पैर के निशान भी हैं जिन्हें एक गुफा के भीतर सुरक्षित रखा गया है। मंदिर की दीवार पर अनेक पशुओं के सींग टंगे हैं जैसे बकरे, मेंढे और भैंसे, यामू, टंगरोल और बारासिंघा। कहते हैं यहां पर जानवरों की बलि दी जाती थी और उसके बाद उनकी सींग यहीं पर टांग दिए जाते थे।

मंदिर के भीतर माता की एक पालकी है जिसे समय-समय पर रंगीन वस्त्र एवं आभूषणों से सुसज्जित करके बाहर निकाला जाता है। हिडिम्बा को काली का अवतार कहा गया है। इसी कारण इस मंदिर के अन्दर दुर्गा की मूर्ति भी है। हिडिम्बा मनाली के ऊझी क्षेत्र की अधिष्ठात्री देवी हैं। इसलिए यहां के लोग खुद को हिडिम्बा देवी की प्रजा मानते हैं। ज्येष्ठ संक्रांति के दिन ढूंगरी में देवी के यहां भारी मेला लगता है। मंदिर के बाहर श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ था। मंदिर के प्रांगण में लोग हिमाचली ड्रेस में फोटो खिंचवा रहे थे। एक ग्रामीण महिला हाथों में अंगोरा खरगोश लिए लोगों को दिखा रही थी। यह खरगोश हमारे यहां पाए जाने वाले खरगोश से आकार में बड़ा होता है और इसके बाल भी बड़े बड़े होते हैं। इस खरगोश के बालों से ऊन बनाई जाती है ,जिससे कई चीज़ें बनती हैं ,जैसे स्वेटर,शॉल आदि। यह शॉल बहुत हलकी और मुलायम होती है। अगर आप भी यह शाल खरीदना चाहते हैं तो हिमाचल हैंडलूम की शॉप से ही खरीदें। यह शॉल थोड़ी क़ीमती होती है पर गर्म बहुत होती है। आप भी दस रुपए  देकर अंगोरा खरगोश को गोद में उठा सकते हैं।

A beatuful girl with a soft Angora rabbit 


मंदिर देखते देखते हमें पूरे दो घंटे लग गए। इसके बाद हमने लंच किया और सोलांग वैली  देखने निकल गए।
सोलांग वैली का ब्यौरा अगली पोस्ट में।

इस सीरीज़ की अगली पोस्ट देखने के लिए यहां क्लिक करें:


फिर मिलेंगे दोस्तों, अगले पड़ाव में हिमालय के कुछ अनछुए पहलुओं के साथ,


तब तक खुश रहिये, और घूमते रहिये,

आपकी हमसफ़र आपकी दोस्त


डा० कायनात क़ाज़ी


गुरुवार, 18 जून 2015

दा ग्रेट हिमालय कॉलिंग....पहला दिन

The great Himalayas calling
Day-1


हमारे देश का गौरव है-दा ग्रेट हिमालय. यह सदियों से कितने ही लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है. साधु संतों को, वैरागियों को, पर्वतारोहियों को और मुझ जैसे राहगीरों को... हर इंसान की तलाश अलग..खोज अलग..कोई ढूंढ़ता आता है शांति,  तो कोई खोज रहा है मोक्ष.. तो कोई प्रकृति की सुंदरता मे बस खो जाना चाहता है... 

दा ग्रेट हिमालय के छोर को सिंधु नदी ने तो दूसरे छोर को ब्रम्हपुत्र ने थाम रखा है. मानो प्रकृति अपनी धवल चुनर से इस बड़े भू भाग को ढक लेना चाहती हो. लोग कहते हैं कि हिमालय मे एक विचित्र-सा आकर्षण है जो कि लोगों को अपनी ओर चुंबक की तरह खींचता है. शायद यही आकर्षण मुझे भी अपनी ओर खींचता रहा है. मैं आप के साथ लेह लद्दाख की अपनी यात्रा का अनुभव पहले ही शयर कर चुकी हूं। इस बार हम हिमालय के बाह्य भाग की यात्रा करेंगे। मैं आपको बता दूँ कि हिमालय इतना बड़ा है कि एक बार मे देखा नही जा सकता है. इसीलिए इसको चार श्रेणियाँ में बांटा गया हैं-

1.    परा-हिमालय

2.    महान हिमालय

3.    मध्य हिमालय,

4.    शिवालिक।



The great Himalayas


कुछ जानकारियां हिमालय के बारे में


हिमालय की सबसे प्राचीन श्रेणी है परा हिमालय जिसे ट्रांस हिमालय भी कहते हैं। यह कराकोरम श्रेणी, लद्दाख श्रेणी और कैलाश श्रेणी के रूप में हिमालय की मुख्य श्रेणियों और तिब्बत के बीच स्थित है।  इसकी औसत चौड़ाई लगभग 40 किमी है।
महान हिमालय जिसे हिमाद्रि भी कहा जाता है हिमालय की सबसे ऊँची श्रेणी है। कश्मीर की जांस्कर श्रेणी भी इसी का हिस्सा मानी जाती है। हिमालय की सर्वोच्च चोटियाँ मकालू, कंचनजंघा, एवरेस्ट, अन्नपूर्ण और नामचा बरवा इत्यादि इसी श्रेणी का हिस्सा हैं।

मध्य हिमालय महान हिमालय के दक्षिण में स्थित है। महान हिमालय और मध्य हिमालय के बीच दो बड़ी और खुली घाटियाँ पायी जाती है - पश्चिम में काश्मीर घाटी और पूर्व में काठमाण्डू घाटी। जम्मू-कश्मीर में इसे पीर पंजाल, हिमाचल में धौलाधार तथा नेपाल में महाभारत श्रेणी के रूप में जाना जाता है।

शिवालिक श्रेणी को बाह्य हिमालय या उप हिमालय भी कहते हैं। यहां सबसे नयी और कम ऊंची चोटी है। पश्चिम बंगाल और भूटान के बीच यह विलुप्त है बाकी पूरे हिमालय के साथ समानांतर पायी जाती है। अरुणाचल में मिरी, मिश्मी और अभोर पहाड़ियां शिवालिक का ही रूप हैं। शिवालिक और मध्य हिमालय के बीच दून घाटियां पायी जाती हैं।




ब्यास सर्किट-हिमाचल प्रदेश, शिवालिक श्रेणी और धौलाधार पर्वत मालाएं 


route map 


हिमाचल प्रदेश में व्यास सैक्टर हिमालय की शिवालिक श्रेणी में पड़ने वाली धौलाधार पर्वत श्रंखलाओं में फैला हुआ है। इन्हें हम ग्रेट हिमालय की सबसे नई पहाड़ियां भी कह सकते हैं. 


दिन-1-दिल्ली से जिभी

दिन-2- जिभी और बंजार वैली

दिन-3-कसोल

दिन-4- कुल्लू

दिन-5- नग्गर

दिन-6- मनाली

दिन-7- कसोली


पहला दिन : दिल्ली से जिभी

कहते हैं कि हिमालय का यह भाग कश्मीर से भी ज़्यादा सुंदर और हरा भरा है. शिवालिक की इन पहाड़ियों को करीब से जानने और समझने के लिए मैनें इस बार चुना है-ब्यास सर्किट. जिसकी शुरुवात की है दिल्ली से. दोस्तों मेरी हमेशा कोशिश रहती है की आपको हर बार किसी ऐसी जगह से रुबरू करवाऊं जो रूटीन टूरिस्ट स्पॉट ना हो. इसी लिए मैनें ब्यास सर्किट चुना. हमारे इस सफ़र का पहला पड़ाव था कुफरी, जोकि शिमला से थोड़ा ऊपर जाकर है. दिल्ली से सुबह पाँच बजे निकल कर हम दोपहर के 2 बजे तक शिमला पहुँच गए थे. शिमला हमेशा की तरह पर्यटकों से भरा हुआ था. हमारी इस यात्रा का पहला पड़ाव था कुफरी जहाँ रुक कर हमनें लंच किया. शिमला और कुफरी आज दोनों जगह ही इतनी ज़्यादा कॉमर्शियल हो चुकी हैं कि यहां आकर लगता ही नही कि हम हिमालय के इतना नज़दीक आ गए हैं. आज मई की 28 तारीख है. दिल्ली और पूरे भारत में ज़बरदस्त गर्मी पड़ रही है. हमनें चण्डीगढ़ के बाद से हिमालयन नेशनल एक्सप्रेसवे से कुफरी पहुँचने का फ़ैसला किया. यह रास्ता परवानू हो कर शिमला जाता है. यह रास्ता परवानू तक 4 लेन है. इसपर ड्राइव करते हुए बड़ा आनंद महसूस होता है. यहाँ तक आप आराम से ड्राइव कर सकते हैं. रोड बहुत अच्छी और चौड़ी है.

The Himalayan Expressway


 परवानू क्रॉस करते ही पहाड़ी रास्ते थोड़े संकरे और घुमावदार हो जाते हैं. आप चाहें तो परवानू पर रुक कर टिम्बर ट्रेल रेस्टोरेंट मे लंच कर सकते हैं पर उसके लिए आपको केबल कार का इंतिज़ार करना होगा. यह रेस्टोरेंट पहाड़ की दूसरी छोटी पर बना हुआ है. हम परवानू को बाईपास करते हुए शिमला की और बढ़े. शिमला पहुँच कर हमने सिटी में जाने के बजाए बाइपास पकड़ कर बंजार वैली का रास्ता लिया. बंजार वैली जलोड़ी पास को क्रॉस करने के बाद आती हैं. परवानू क्रॉस करते ही उँचे उँचे देवदार के पेड़ ठंडी हवा के खुश्बुदार झोंकों के साथ आपका स्वागत करते मिल जाएँगे. दूर तक फेले पाईन के हरे भरे जंगल आपको पहाड़ों पर होने का अहसास करवाते हैं. कुफरी क्रॉस करने के साथ ही आपको पहाड़ी गुमावदार रास्ते मिलेंगे. यह रास्ते पहाड़ों को काट कर बनाए हुए हैं. यहाँ से वैली का नज़ारा बेहद सुंदर दिखाई देता है.पहाड़ों में परत दर परत फैली खूबसूरती मुझे स्पीचलेस कर जाती है। यहाँ की खूबसूरती को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है। कोई भी कैमरा इस खूबसूरती को पूरी तरह क़ैद नहीं कर सकता है। इसका तो सिर्फ अनुभव ही किया जा सकता है।  नीचे दूर दूर बसे गाँव और मीलों तक फेले फलों के बगीचे. जिनमे सेब, आडू, चैरी, बादाम और खूबानी के पेड़ लगे हुए हैं. जब इन पेड़ों पर फल आने लगते हैं तब किसान ओलों से इन फलों को सुरक्षित करने के लिए इन पर बारीक जाली कवर कर देते हैं. इन रास्तों से गुज़रते हुए कुछ कुछ दूरी पर आपको सुंदर सुंदर पहाड़ी घर भी दिखाई देंगे. जिनकी टीन से बनी हुई छतें लाल या हरे रंग की होती हैं. पहाड़ी घरों को बनाना में मज़बूत देवदार की लड़की का इस्तेमाल किया जाता है. 


Himalayan Village


यह घर अंदर से जितने कोज़ी होते हैं बाहर से उतने ही सुंदर दिखाई देते हैं. बिल्कुल फैरीटेल वाली किताबों मे बने सुंदर से कौटेज जैसे. इन घुमावदार रास्तों पर ड्राइव करते हुए आपको कई जगह फ्रेश फ्रूट्स बेचने वाले भी दिख जाएँगे. सेब, आडू, बादाम और फार्म फ्रेश चैरी. हिमाचल प्रदेश मे रहने वाले लोगों का मुख्य व्यवसाय खेती है. यहाँ धान, गेंहूँ और फलों के बागीचे होते हैं. हम रात होने से पहले जलोडी पास को क्रॉस करना चाहते थे इसलिए बिना वक़्त गँवाए हम अपने पहले नाइट स्टे के लिए जिभी की और बढ़ रहे थे. जलोडी पास दुनिया के कठिनतम पासों में गिना जाता है. नेशनल जिओग्राफी ट्रेवलर ने इसे दुनिया के दस सबसे मुश्किल ट्रेक माने जाने वाले पासों में गिना है. हम जैसे-जैसे जलोडी पास से नज़दीक पहुँच रहे थे रास्ता और मुश्किल होता जा रहा था .हमनें काम से कम हज़ार दो हज़ार मोड़ क्रॉस किये होगे. हर पहाड़ के घुमाव के साथ लगता कि  अब बस पहुँचने ही वाले हैं। हम कितनी ही बार ड्राइव करते हुए पहाड़ों की तलहटी में पहुँच जाते तो लगता कि बस अब हम समतल सड़क पर पहुँचने वाले हैं कि  तभी अगले मोड़ पर हम दूसरे पहाड़ की चढ़ाई चढ़ने लगते ,एक रोलर कोस्टर राइड की तरह। हमने पास क्रॉस करते हुए जगह जगह थोड़ी थोड़ी बर्फ भी देखी।



जलोड़ी पास के लिए जाने वाली सड़क एकदम संकरी हो गई थी जोकि जगह-जगह से खराब भी हो गई थी. भारत मे यह अपने आप मे एक ऐसा पास है जोकि साल भर खुला रहता है. लेकिन यहाँ से गुज़रने से पहले दिए गए दिशा निर्देशों का पालन करना बेहद ज़रूरी है. पास के नज़दीक आते आते आपको कई सरकारी बोर्ड दिख जाएँगे जिसमें सावधानी के लिए निर्देश लिखे हुए हैं. जैसे-इस पास से गुज़रते हुए गाड़ी पहले गियर मे चलाएँ. स्पीड काफ़ी कम रखें. यहां पर खाई, ढलान और चडाइयाँ बहुत तीखी हैं और बहुत सारे अंधे मोड़ हैं. इस पास की उँचाई समुद्र तल से 3120 मीटर है. इस पास पर गर्मियों मे आपको बर्फ नही दिखाई देगी. यहाँ पर सर्दियों मे बर्फ देखी जा सकती है. यह पास कुल्लू वैली को रामपुर के साथ कनेक्ट करता है .इस पास में एक ओर उँचे उँचे पहाड़ हैं और दूसरी और गहरी खाई है. इस रास्ते में जगह जगह सुंदर वैली के द्रश्य हैं. एक नदी कभी आपके दाईं ओर चलती है तो कभी बाईं ओर. नदी का साफ पानी पत्थरों पर गिरते हुए शोर मचाता हुआ एक संगीत की स्वर लहरी पैदा करता है. मेरा खुद का एक्सपीरियेन्स कहता है कि इस पास को दिन के समय में ही क्रॉस करना चाहिए.

Jibhi camps & cottages


हम रात के नौ बजे तक जिभी पहुँच गए थे. यह हमारा पहला पड़ाव था. रात बहुत हो चुकी थी.पहाड़ों में सूरज डूबते ही अंधेरा छा जाता है और रात के नौ बजे ही रास्तों पर सन्नाटा छा जाता है. हम भी बहुत थक चुके थे. आज हमने पहले दिन 543 किलोमीटेर की यात्रा की थी. जिभी में जिभी कैंपस और कोटेजेज़ में हम ने खुले आसमान के नीचे तारों की रोशनी मे कैंपस के अंदर रात गुज़ारी. नज़दीक से ही तीर्थन नदी के बहने की आवाज़ आ रही थी. यहाँ रात का टेंपरेचर 6 डिग्री था.


water spring@Jibhi_Tirthan Valley




फिर मिलेंगे दोस्तों, ब्यास सैक्टर के अगले पड़ाव के कुछ अनछुए पहलुओं के साथ,

तब तक खुश रहिये, और घूमते रहिये,

आपकी हमसफ़र आपकी दोस्त



डा० कायनात क़ाज़ी