India's First Hindi Travel Photography Blog: Home

कुछ पंक्तियां इस ब्लॉग के बारे में :

प्रिय पाठक,
हिन्दी के प्रथम ट्रेवल फ़ोटोग्राफ़ी ब्लॉग पर आपका स्वागत है.….
ऐसा नहीं है कि हिन्दी में अच्छे ब्लॉग लिखने वालों की कमी है। हिन्दी में लोग एक से एक बेहतरीन ब्लॉग्स लिख रहे हैं। पर एक चीज़ की कमी अक्सर खलती है। जहां ब्लॉग पर अच्छा कन्टेन्ट है वहां एक अच्छी क्वालिटी की तस्वीर नहीं मिलती और जिन ब्लॉग्स पर अच्छी तस्वीरें होती हैं वहां कन्टेन्ट उतना अच्छा नहीं होता। मैं साहित्यकार के अलावा एक ट्रेवल राइटर और फोटोग्राफर हूँ। मैंने अपने इस ब्लॉग के ज़रिये इस दूरी को पाटने का प्रयास किया है। मेरा यह ब्लॉग हिन्दी का प्रथम ट्रेवल फ़ोटोग्राफ़ी ब्लॉग है। जहाँ आपको मिलेगी भारत के कुछ अनछुए पहलुओं, अनदेखे स्थानों की सविस्तार जानकारी और उन स्थानों से जुड़ी कुछ बेहतरीन तस्वीरें।
उम्मीद है, आप को मेरा यह प्रयास पसंद आएगा। आपकी प्रतिक्रियाओं की मुझे प्रतीक्षा रहेगी।
आपके कमेन्ट मुझे इस ब्लॉग को और बेहतर बनाने की प्रेरणा देंगे।

मंगल मृदुल कामनाओं सहित
आपकी हमसफ़र आपकी दोस्त

डा० कायनात क़ाज़ी
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गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

रंण उत्सव-2016:रंण उत्सव तो एक बहाना है, गुजरात मे बहुत कुछ दिखाना है....

रंण उत्सव-2016

रंण उत्सव तो सिर्फ़ एक बहाना है,  गुजरात मे बहुत कुछ दिखाना है....


यह लाइन किसी ने सही कही है, क्यूंकि रंण उत्सव के बहाने ही मैने बहुत कुछ ऐसा देख डाला जिसे देखने शायद अलग से मैं कभी आती ही नही गुजरात। इस बार मौक़ा था रंण उत्सव मे जाने का। चार दिन की मेरी यह तूफ़ानी यात्रा अपने मे समेटे थी बहुत कुछ अनोखा। अहमदाबाद से सुरेन्द्रनगर, सुरेन्द्रनगर से गाँधी धाम और गाँधी धाम से धोर्ड़ो गाँव जहाँ कि रंण उत्सव मनाया जाता है।  मैं पहले ही बता दूं कि इनमे से कोई भी जगह आस पास नही है लेकिन गुजरात के हाई वे बहुत अच्छे हैं कि आप बिना किसी तकलीफ़ के लंबी रोड यात्रा कर सकते हैं।



चलिए तो फिर यात्रा शुरू करते हैं। मैं अहमदाबाद पहुँच कर निकल पड़ी सुरेन्द्रनगर में वाइल्ड एस सेंचुरी  देखने।  क्या है खास इस सेंचुरी मे? यही सवाल मेरे मन मे भी उठा था।  पाँच हज़ार वर्ग किलोमीटर  मे फैला यह वेटलैंड किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर लेता है।  इसे लिट्ल रंण ऑफ कच्छ कहते हैं।  यह जगह इसलिए मशहूर है कि पूरी दुनिया मे सिर्फ़ यहीं वाइल्ड एस पाए जाते आईं।  वाइल्ड एस यानि कि जंगली गधे। कहते हैं की यहाँ लगभग 3000 वाइल्ड एस हैं। इसके अलावा यहाँ कई अन्य जानवर भी पाए जाते हैं।




मुझे इस जगह की सबसे अच्छी बात यह लगी कि यहां तक पहुँचना बहुत आसान है। मीलों तक फैला वेटलैंड जिसे बड़ी आसानी से जिप्सी मे बैठ कर देखा जा सकता है। सबसे अच्छी बात तो यह है कि यह सेंचुरी बर्ड वाचिंग के लिए बहुत अच्छी है।  मेरी पिछली गुजरात की यात्रा में हम फ्लैमिंगो ढूंढते हुए मांडवी मे कितनी दूर तक समुद्र तट पर चले थे और फिर भी हमे फ्लैमिंगो नही मिले थे लेकिन यहाँ इस सेंचुरी मे जगह जगह वॉटर बॉडी बनी हुई हैं जहां फ्लैमिंगो के झुंड के झुंड देखने को मिल जाते हैं वो भी बड़ी आसानी से। बस ज़रूरत है तो  एक अदद ज़ूम लेंस की, और वो भी कम से कम 400 या 600 mm का ज़ूम लेंस ।




वाइल्ड एस  थोड़े शर्मीले होते हैं अपने नज़दीक गाड़ियों को देख कर झट से झाड़ियों मे घुस जाते हैं। हमे घूमते-घूमते शाम हो गई। सामने सूरज अस्त की ओर चल पड़ा था। यहाँ की दलदली मिट्टी नमक की अधिकता के कारंण बंजर है। लेकिन देखने मे सुंदर लगती है। दूर तक फैला मैदान और सुंदर सनसेट वहीं रुकने को मजबूर कर रहा था। यह दिसंबर का महीना है लेकिन यहाँ ठंड नही है। हवा अच्छी लग रही है। कुछ देर ठहर के सनसेट का मज़ा लिया और फिर चल पड़े अपने डेरे की ओर।

यहीं पास ही एक रिज़ॉर्ट मे ठहरने की ववस्था की गई है। पहला दिन ख़त्म होने को आया। आज चौदहवीं की तो नही लेकिन 12ह्वीं की रात है इसलिए चाँद आसमान मे कुछ ज़्यादा ही चमक रहा है। अभी इसे और चमकना होगा। चाँदनी रात मे रंण के सफेद रेगिस्तान को देखने लोग खास तौर पर पूर्णिमा के दिन आते हैं। यही वहाँ का मुख्य आकर्षण है।

दूसरा दिन थोड़ा लंबा होने वाला था हमे सुरेन्द्र नगर से गाँधी धाम की यात्रा तय करनी है। यह यात्रा कुल 206 किलो मीटर की होने वाली है। रास्ते मे हम कई गाँव देखेंगे। ऐसे गाँव जिनमे छुपा है इतिहास। कच्छ की प्राचीन हस्त कला और वैभव का इतिहास। यहीं पास ही एक गाँव है जिसका नाम है खारा घोड़ा। कहते हैं इस गाँव मे 111 साल पुराना शॉपिंग माल है। जिसे अँग्रेज़ों ने 1905 मे बनवाया था। आज यहाँ कुछ दुकाने मौजूद हैं जोकि गाँव वालों की ज़रूरत का सामान एक ही छत के नीचे उपलब्ध करवाती है। इस गाँव से थोड़ा आगे बढ़ते ही हमे नमक की खेती होते दिखने लगती है। यह पूरा प्रोसेस देखना भी एक अनुभव है। नमक कैसे बनता है इसकी कहानी तफ्सील से जानने के लिए यहाँ क्लिक करें:






अभी तक मुझे गुजरात मे आए हुए 2 दिन हो चुके हैं लेकिन मैने भूंगे नही देखे। भूंगे यानी के मिट्टी के बने गोल घर जोकि कच्छ के ग्रामीण जीवन की पहचान है। मेरी इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य था कि मैं कच्छ मे रहने वाले जनजातीय जीवन को देख पाऊं।  इसीलिए मैने इस बार गाँवों की यात्रा का मन बनाया। मेरा अगला पड़ाव होगा ऐसे ही एक गांव। जहाँ मैं कच्छी कला से जुड़े समुदायों से मिल सकूँ। हम भुज के बहुत नज़दीक हैं और भुज के नज़दीक ही एक गाँव पड़ता है जिसका नाम है सुमरासार शैख़। इस गाँव की एक ख़ासियत है। यहाँ कच्छ मे किए जाने वाली कढ़ाई के काम की सबसे बेहतरीन क़िस्म यहीं देखने को मिलती है। इस गाँव  मे कई NGO और संगठन यहाँ की कला के संरक्षण के लिए काम करते हैं। मैं धूल उड़ाती कच्ची सड़कों को पार करते हुए ऐसी ही एक जगह पहुँच गई हूँ। यह कला रक्षा केंद्र है जहाँ सूफ कला के संरक्षण के लिए कार्य किया जाता है।






यहाँ मिट्टी के गोल घर मुझे आकर्षित करते हैं जिनके बीचों बीच मे एक छोटा-सा आँगन है जहाँ काले लिबास मे कुछ महिलाएँ कढ़ाई का काम कर रही हैं। यह महिलाएँ मारू मेघवाल और रबाड़ी जनजाति से संबंध रखती है और सिंगल धागे से कपड़े पर त्रिकोण आकर की ज्योमित्री डिज़ाइन की कढ़ाई करती हैं। यह बेहद नफीस और बारीक कढ़ाई है। जिसे बड़ी महारत से किया जाता है। कहते हैं इस कला को करने वाले की ऑंखें जल्द ही साथ छोड़ जाती हैं। यह कलाकार कपडे पर उलटी तरफ ताने बानों को उठा कर कढ़ाई करती हैं और सीधी तरफ डिज़ाइन बनती जाती है। इस जनजाति का संबंध पाकिस्तान से है। और यह विस्थापित होकर यहाँ कच्छ मे आ बसे। इनके काम मे महीनो का समय लगता है। लेकिन इनके द्वारा किए गए कढ़ाई के काम की फैशन डिज़ाइनरों मे बड़ी माँग है।


मेरी इस यात्रा में ऐसे ही एक और गांव में मैंने बड़े ही खूबसूरत गोल घर देखे। इस गांव का नाम था - भरिन्डयारी,  कच्छ मे कई प्रकार की कढ़ाई के नमूने देखने को मिलते हैं।  कहते हैं यह कला पाकिस्तान के सिंध प्रांत से कच्छ मे आई और इस सफर में राजस्थानी कला और यहाँ की स्थानीय कला ने इसे और समृद्ध बनाया।  पहले महिलाएँ अपनी बेटियों के शादी के जोड़े खुद तैयार करती थीं। आज यहाँ भाँति-भाँति की कढ़ाइयाँ देखने को मिलती हैं। जैसे खारेक, पाको, राबरी, गारसिया जात और मुतवा।



मुझे सुकून है कि मैं अपनी इस यात्रा मे असली गुजरात को देख पा रही हूँ।  मेरा अगला पड़ाव है होड़का गाँव जोकि धोर्ड़ो के रास्ते मे पड़ता है। इस गाँव की ख़ासियत है यहाँ के गोल घर। मिट्टी की दीवारें और अंदर से बड़े खूबसूरत होते हैं यह घर। आप भी देखिए। एक बार यहाँ आकर यहाँ से वापस जाने का मन नही करेगा। यह लोग अपने घरों को बहुत खूबसूरती से सजाते हैं। घर की दीवारों पर, छत को सब जगह कलाकारी देखने को मिलती है।



क्यूंकि यहाँ की मिट्टी बंजर है इसीलिए शायद यहाँ के लोगों के जीवन मे रंगों का बड़ा महत्व है। इनके कपड़े बड़े कलरफुल होते हैं। रंगीन धागे, शीशा, रंगीन मोती और ऊन के बने यह वस्त्र बहुत आकर्षक हैं। भूंगों मे दिन गुज़ारने के बाद मेरी यात्रा का अंतिम पड़ाव भी आ पहुँचा है। और यह है धोर्ड़ो गाँव जोकि भुज से 80 किलोमीटेर दूर है। यहाँ से सफेद रंण शुरू होता है। यहीं पर हर साल रंण उत्सव मनाया जाता है। देखा जाए तो यहाँ कुछ भी नही है सिवाए मीलों तक फैले सफेद रंण के लेकिन यहाँ रंण उत्सव मानने के लिए पूरा का पूरा टेंट सिटी बसाया जाता है। जोकि किसी स्वप्न लोक जैसा है। ठहरने के लिए वर्ल्ड क्लास टेंट्स लगाए गए हैं और यहाँ शुद्ध गुजराती खाने का प्रबंध किया गया है।



हम दोपहर होते होते धोर्ड़ो पहुँचे। बहुत भूक लगी थी तो सीधे डाइनिंग हॉल मे पहुँच गए। यहाँ का इंतज़ाम बहुत अच्छा है।  सब कुछ पर्फेक्ट। चेक इन से लेकर खाने पीने और रंण मे जाने की व्यवस्था तक सब कुछ पर्फेक्ट।

शाम को रंण उत्सव का शुभारम्भ माननीय मुख्यमंत्री श्री विजय भाई रुपानी के हाथों एक रंगारंग कार्यक्रम के साथ हुआ। हम सब ऊंट गाड़ी पर बैठ कर रंण मे पहुँचे। दूर तक फैला रंण बहुत सुंदर दिखता है। रात मे जब पूर्णिमा का चाँद रोशनी से सारे रंण को जगमगा देगा तब सैलानी इस अद्भुत नज़ारे को देखने रंण मे आएँगे। जिसकी व्यवस्था पहले से ही की गई है।



धवल चाँदनी मे रंण देखना एक अनोखा अनुभव है। मैं कहूँगी कि यह एक ऐसा अनुभव है जिसे सिर्फ़ महसूस ही किया जा सकता है। इसलिए कैमरे मे क़ैद करने के चक्कर मे न पड़ें। बस रण  में जाकर इसका लुत्फ़ उठाएं। ठंडी हवाओं के बीच रंण मे दूर तक सफेद चाँदनी को निहारना बहुत खूबसूरत अनुभव है।



यहाँ टेंट सिटी के पास ही क्राफ्ट बाज़ार है जहाँ कच्छ के हैंडी क्रॅफ्ट आइटम खरीदे जा सकते है। मेरे इस चार दिन के प्रवास मे मैने कच्छी एंबरोएडरी की सैंकड़ों साल पुरानी विरासत को क़रीब से देखा। साथ ही भिन्न-भिन्न प्रकार की जनजातियों के लोगों के जीवन को क़रीब से देखा।

मेरी इस यात्रा का एक और हाईलाइट है और वो है यहाँ का खाना। कहते हैं गुजराती खाना मीठा होता है। पर यह पूरा सच नही है।  यहाँ मीठे के साथ कई अन्य स्वाद भी है, आप ट्राई तो कीजिए।  मैने अपनी पूरी यात्रा मे गुजरात के अलग अलग स्वादों को चखा।  खमंड, धोखला, फाफड, थेपला, गुजराती थाली और भी बहुत कुछ।



गुजरात घूमने कब जाएं?

वैसे तो वर्ष में कभी भी गुजरात घूमने जाया जा सकता है लेकिन रण उत्सव हर वर्ष दिसंबर माह में होता है जोकि फरवरी तक चलता है। अगर आप रंण उत्सव देखने जा रहे हैं तो उद्घाटन के आसपास ही जाएं। फरवरी तक मेले का उत्साह थोड़ा ठंडा हो जाता है।

कैसे पहुंचें?

रंण उत्सव धोरडो नमक गांव में किया जाता है जिसके सबसे नज़दीक भुज(71 किलोमीटर) है। रण उत्सव के लिए आप बाई एयर या ट्रैन से भी जा सकते हैं। नज़दीकी एयरपोर्ट अहमदाबाद है। भुज एयरपोर्ट सबसे नज़दीक है लेकिन फ्लाइट्स बहुत ज़्यादा नहीं हैं, जबकि अहमदाबाद एयरपोर्ट देश के सभी बड़े शहरों से जुड़ा हुआ है। अहमदाबाद से धोरडो की दूरी 370 किलोमीटर है। सड़कें अच्छी हैं लेकिन रास्ता थोड़ा लंबा है।

फिर मिलेंगे दोस्तों, भारत दर्शन में किसी नए शहर की यात्रा पर, तब तक खुश रहिये, और घूमते रहिये,

आपकी हमसफ़र आपकी दोस्त

डा० कायनात क़ाज़ी

गुरुवार, 18 जून 2015

दा ग्रेट हिमालय कॉलिंग....पांचवां दिन, नग्गर

The great Himalayas calling....Naggar Castle
Day-05

पांचवां दिन - नग्गर


Naggar castle

इस सीरीज़ की पिछली पोस्ट देखने के लिए यहां क्लिक करें: दा ग्रेट हिमालयकॉलिंग....चौथा दिन-कुल्लू - देकपो शेडरूपलिंग मोनेस्ट्री
नग्गर कैसल

विश्व धरोहर नग्गर कैसल में हर साल देशी और विदेशी पर्यटक ठहरना पसंद करते ही हैं साथ ही यह जगह हमारी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को भी खूब लुभाती है। यहाँ कई मशहूर फिल्मों की शूटिंग हुई है। जैसे जब वी मेट, माचिसतेरे नाल लव हो गया आदि। काष्ठकुणी शैली की बनी इस इमारत की अपनी ही खासियत है। यहां पर प्राचीन संग्रहालय भी है जो पर्यटकों का आकर्षण का केन्द्र बना रहता है। संग्रहालय में यहां की प्राचीन संस्कृति के दर्शन होते हैं। इन सभी के कारण यहां पर पर्यटक  ठहरना पसंद करते हैं.इस कैसल में एक मंदिर भी है। इसके रेस्टोरेन्ट का कुछ हिस्सा झरोखे स्टाइल में बनाया गया है। जहाँ बैठ कर डिनर एन्जॉय किया जा सकता है। इस जगह से पूरी कुल्लू वैली दिखाई देती है.

Tample inside Naggar castle


कुल्लू की प्राचीन राजधानी रहे ऐतिहासिक गांव नग्गर की प्राचीन इमारत नग्गर कैसल आज हिमाचल के विश्व धरोहर में से एक है। इसकी खासियत के चर्चे देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी हैं। इसी कारण विदेशी पर्यटक नग्गर कैसल को देखने के लिए लालायित रहते हैं। नग्गर कैसल प्राचीन काष्ठकुणी शैली में बनी इमारत अपने आप में अद्भुत है।यहाँ के लोग इस ईमारत से जुडी एक कहानी सुनाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि इतना बड़ा कैसल कभी सिर्फ एक बन्दूक के लिए बिका था। हुआ यूं कि एक बार इस कैसल को देखने एक अँगरेज़ आया और उस अंग्रेज को यह इमारत इतनी भा गई  कि यहां के राजा को एक बंदूक का लालच देकर उसने इसे खरीद लिया था। जानकारी के अनुसार नग्गर राजा जगत सिंह के अधीन था। 1846 में राजा ज्ञान सिंह ने एक पुरानी बंदूक के लिए नग्गर कैसल को यहां रहे एक अंग्रेज सहायक उपायुक्त मेजर को बेच दिया था।

 
Accommodation@ Naggar Castle

 आज पर्यटन निगम इसे होटल के रूप में प्रयोग कर रहा है और सही माइनो में देखा जाए तो यह जगह सरकारी तौर तरीके के चलते अपनी चमक खो राखी है. ।मैंने यहाँ  पहले कहीं पढ़ा था कि  होटल के रूप में नग्गर कैसल की अलग ही खासियत है जो अन्य होटलों में नहीं है। इसलिए यहाँ आने से पहले मेरे मन में भी इस जगह को लेकर बहुत उम्मीदें थीं पर इस जगह को जितना अच्छा होना चाहिए था यह उस उम्मीद पर खरी नहीं उतर पाई।

 
Heritage @Naggar casle

एनके बाली, एजीएम, पर्यटन विकास निगम कुल्लू के अनुसार  नग्गर कैसल का निर्माण कुछ इस तरह हुआ था.नग्गर गांव 1460 सालों तक कुल्लू रियासत का केन्द्र रहा है। 16वीं शताब्दी में राजा सिद्दी सिंह ने नग्गर कैसल का निर्माण कुल्लू की प्राचीन काष्ठकुणी शैली में किले के रूप में शुरू किया। इसके निर्माण के लिए पत्थरों को ब्यास नदी के दाएं तट पर स्थित बड़ागढ़ क्षेत्र से राजा भोसल के दुर्गनुमा महल के खंडहरों से लाया गया था। एक अनुमान के आधार पर इसके निर्माण में 2000 से अधिक देवदार के पेड़ों का प्रयोग हुआ है। इसके निर्माण में लोहे की एक भी कील का प्रयोग नहीं हुआ है। यह किला इतनी मजबूती से बना है कि आज तक जितने भी भूकंप हुए हैं, उससे इमारत को कोई नुक्सान नहीं हुआ है। 1905 का भूकंप भी इस इमारत का बाल बांका नहीं कर पाया था।

 
Main campus Naggar castle

नग्गर कैसल में कुल 17 कमरे हैं। इनके नाम नम्बरों के आधार पर नहीं बल्कि नाम के आधार पर रखे गए हैं। जानकारी के अनुसार 4 बिस्तरों वाले कमरे का नाम शाही सुईट, ओक हिज हाईनैस सुईट, हर हाईनैस सुईट, ट्रगोफन सुईट, ग्रीन फील्ड सुईट, रिवर ब्यू सुईट, कोर्ट यार्ड सुईट, फोजल पिक सुईट, बड़ागढ़ सुईट, फोरैस्ट ब्यू, त्रिपुरा सुईट, चंद्रखणी सुईट, कैसल ब्यू सुईट तथा देविका सुईट आदि नाम कमरों के रखे गए हैं। एक रात के ठहरने का किराया थोड़ा महंगा  है।

 
Few information about Naggar

ऐसे पहुंचें नग्गर कैसल


कुल्लू मुख्यालय से दाएं और बाएं तट की ओर से नग्गर 20 किलोमीटर दूर है। पतलीकूहल से दाएं तरफ बाईपास से नग्गर पहुंचा जा सकता है। नग्गर बस स्टैंड से 2 किलोमीटर दूरी पर रोरिक आर्ट गैलरी से पहले नग्गर कैसल आता है।
फिर मिलेंगे दोस्तों, ब्यास सैक्टर के अगले पड़ाव के कुछ अनछुए पहलुओं के साथ,

तब तक खुश रहिये, और घूमते रहिये,

आपकी हमसफ़र आपकी दोस्त



डा० कायनात क़ाज़ी



सोमवार, 15 जून 2015

ताज महल में और भी बहुत कुछ है ख़ास

 


वास्तुकला

ताज महल मुगल साम्राज्य की  वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है। इसकी वास्तु शैली फारसी, तुर्क, भारतीय एवं इस्लामिक वास्तुकला के घटकों का अनोखा मेल प्रस्तुत करती  है।मुग़ल मध्य एशिया से भारत आए थे ,और वह जहाँ जहाँ से होकर गुज़रे उन स्थानों की  उन्होंने  खुली  अपनाया। इसीलिए मुग़ल वास्तुकला इस्लामिक वास्तु शैलीतुर्की, फ़ारसी व भारतीय राजपुताना वास्तु शैली का मिला जुला रूप है।
 सन् 1983 मेंयुनेस्को  ने ताज महल को विश्व धरोहर घोषित किया। इसके साथ ही इसे विश्व धरोहर के सर्वत्र प्रशंसित, अत्युत्तम मानवी कृतियों में से एक बताया गया। ताजमहल को भारत की इस्लामी कला का रत्न भी घोषित किया गया है।



उद्यान (चारबाग)

 ताज महल के परिसर में बने उद्यान पवित्र कुरान में वर्णित स्वर्ग (जन्नत) के स्वरुप से प्रेरणा लिए हुए हैं। पवित्र कुरान में जन्नत के बागों का ज़िक्र कुछ इसी तरह दिया.
खूबसूरत बाग जिनके बीच से सफ पानी की नहरें बह रही होंगी. शाहजहाँ को बागों से बहुत मुहब्बत थी इसी लिए ताज महल के चारों ओर बाग बनवाए.नदी के उत्तरी छोर पर महताब बाग बनवाया.ताज महल को देखने के लिए लोग महताब बाग खास तौर पर जाते हैं.


मुख्य ईमारत

क्यूंकि ताज महल हुमायूँ के मक़बरे के काफी बाद में बना था इसलिए इस ईमारत के आधार  मंज़िल दिल्ली स्थित हुमायूँ के मक़बरे से प्रभावित है। एक वर्गाकार नींव की  आधार शिला  पर बना  सफ़ेद  संगमर्मर का मकबरा ताज महल का केन्द्र बिंदु मन जाता है। इसका मूल-आधार एक विशाल बहु-कक्षीय संरचना है। यह प्रधान कक्ष घनाकार है, जिसका प्रत्येक किनारा लगभग  55 मीटर है।



ताज  देखो वो नया ही लगता  है.यह दुनियां की सबसे ज़्यादा पहचानी जाने  ईमारत है। इसे शाहजहाँ ने अपनी तीसरी पत्नी  मुमताज महल की याद में मृत्योपरांत बनवाया था । इसका सफ़ेद सफ़ेद  संगमर्मर का गुम्बद वाला भाग, इस इमारत का मुख्य परिचित भाग है, वहीं इसकी पूर्ण इमारत समूह बाग, बगीचों सहित 22.44 हेक्टेयर के दायरे में   फैला  है.  इसका निर्माण आरंभ हुआ 1632 CE में, (1041 हिजरी अनुसार), यमुना नदी के दक्षिणी किनारे पर हुआ।उस्ताद अहमद लाहौरी  ताज महल के प्रधान वास्तुकार माने जाते हैं ।


मकबरे पर सबसे ऊपर  संगमर्मर का गुम्बद बना हुआ है ,जोकि  इसका सर्वाधिक शानदार भाग है। इसकी ऊँचाई लगभग इमारत के आधार के बराबर, 35 मीटर है, और यह एक 7 मीटर ऊँचे बेलनाकार आधार पर स्थित है।
गुम्बद के आकार को और सुंन्दर दिखाने के लिए  चार किनारों पर स्थित चार छोटी गुम्बदाकारी छतरियों  बनाई गई है।मेन चबूतरे  के चारों कोनों पर चार विशाल मीनारें  बनाई गई  हैं। यह प्रत्येक 40 मीटर ऊँची है। यह मीनारें ताजमहल की बनावट को चारों दिशाओं से समानता का आभास प्रस्तुत करती हैं ।

मस्जिद



यहाँ एक खूबसूरत मस्जिद भी है, मुगल वास्तुकला मे संतुलन को बहुत महत्व दिया गया है इसलिए बाईं ओर बनी मस्जिद को संतुलित करने के लिए दाई ओर भी एक मस्जिद जैसी ईमारत बनाई गई है जिसे जवाब कहते हैं.



ताज महल में एक संग्रहालय भी है। जिसमे मुग़ल कालीन कुछ नायाब वस्तुओं को संजो कर रखा गया है। 

कब जाएं

ताज महल देखने के लिए अक्टूबर से फ़रवरी तक का समय अच्छा माना जाता है।

कैसे पहुंचें

आगरा रेल और सड़क मार्ग से भली प्रकार जुड़ा है।




फिर मिलेंगे दोस्तों, भारत दर्शन में किसी नए शहर की यात्रा पर,
तब तक खुश रहिये, और घूमते रहिये,

आपकी हमसफ़र आपकी दोस्त



डा० कायनात क़ाज़ी

गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

Heritage walk-Durga puja part-2




 दुर्गा पूजा- यह पर्व नहीं परम्परा है 
Part-2


 यह पूजा नौ दिनों तक चलने वाली पूजा है। मैंने अपने बंगली मित्रों से इस पर्व की जानकारी जुटाई जिसे मैं आपके साथ भी साझा करुँगी। महालया के दिन से पूजा शुरू होती है। बंगाली परिवारों में चंडी पाठ किया जाता है या फिर टीवी या रेडियो पर सुना जाता है। चंडी पाठ में महिषासुरमर्दिनी की कथा एक मधुर और लयबद्ध सुर में संस्कृत और बांग्ला में मंत्रोच्चारण के साथ सुनाते हैं 


कथा के मुख्य अंश आपके लिए -
असुर महिष ने घोर तपस्या की और ब्रह्म देव प्रसन्न हो गए। महिष ने अमरता का वरदान माँग लिया मगर ब्रह्म देव के लिए ऐसा वरदान देना संभव नहीं था तब महिषासुर ने एक चाल चली और  वरदान माँगा कि अगर उसकी मृत्यु हो तो किसी औरत के हाथों। उसे विश्वास था कि निर्बल महिला उस शक्तिशाली का कुछ नहीं बिगाड़ सकती। ब्रह्म देव ने वरदान दे दिया और शुरू हो गया महिषासुर का उत्पात। सभी देवता उससे हार गए और इंद्र देव को भी अपना राजसिंहासन छोड़ना पड़ा। महिषासुर ने ब्राह्मणों और निरीह जनों पर अपना अत्याचार बढ़ा दिया। सारा जग त्राहि-त्राहि कर उठा और तब सभी देवों ने मिलकर अपनी-अपनी शक्ति का अंश दे कर देवी के रूप में एक महाशक्ति का निर्माण किया। 

नौ दिन और नौ रात के घमासान युद्ध के बाद देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध किया और वो महिषासुरमर्दिनी कहलाईं। महालया के दिन ही माँ दुर्गा की अधूरी गढ़ी प्रतिमा पर आँखें बनाईं जाती हैं जिसे चक्षु-दान कहते हैं। इस दिन लोग अपने मृत संबंधियों को भी याद करते हैं और उन्हें 'तर्पण' अर्पित करते हैं। महालया के बाद ही शुरू हो जाता है देवीपक्ष और जुट जाते हैं सब लोग त्यौहार की तैयारी में, ज़ोर-शोर से।


पौराणिक कथाओं के अनुसार ऐसा माना जाता है कि हर साल दुर्गा अपने पति शिव को कैलाश में ही छोड़ अपने बच्चों गणेश, कार्तिकेय, लक्ष्मी और सरस्वती के साथ सिर्फ़ दस दिनों के लिए मायके  आती हैं। उनकी प्रतिमा की पूजा होती है सातवें, आठवें और नौवें दिन। छठें दिन या षष्ठी के दिन दुर्गा की प्रतिमा को पंडाल तक लाया जाता है। दुर्गा की प्रतिमाएँ एक महीने पहले से गढ़नी शुरू हो जाती हैं और उससे भी पहले से तैयार होने लगते हैं पंडाल। दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में कई जगह बंगाल से आए कारीगर प्रतिमाएं बनाने का काम करते हैं। 

दुर्गा की सुंदर प्रतिमाएँ गढ़ने के लिए जहाँ मिट्टी से ये मूर्तियाँ बनाईं जाती हैं  लकड़ी के ढांचे पर जूट और भूसा बाँध कर तैयार होता है प्रतिमा बनाने का आधार और बाद में मिट्टी के साथ धान के छिलके को मिला कर मूर्ति तैयार की जाती है। प्रतिमा की साज-सज्जा बड़ी मेहनत के साथ की जाती है जिसमें नाना प्रकार के वस्त्राभूषण उपयोग में लाए जाते हैं।



बंगाल के अलग अलग क्षेत्रों से आने वाले कलाकार साल भर पहले  से माँ के आभूषण और वस्त्र तैयार करते हैं.कारीगरों का एक जत्था जहाँ दुर्गा माँ की मूर्तियां तैयार करने में लगा होता है वहीँ दूसरा  पंडाल सजाने के काम में जुटा होता है। आजकल थीम पंडालों की धूम है। हर बार पंडालों में कुछ नया और कलात्मक करने की होड़ लगी रहती है.




षष्ठी के दिन प्रतिमा को पंडाल में लाकर रखा जाता है और शाम को 'बोधन' के साथ दुर्गा माँ के मुख से आवरण हटाया जाता है। महाषष्ठी के दिन घर की औरतें व्रत  रखती हैं और शाम को मैदे से बनी पूरियाँ खाती हैं।मैदे से बानी इन पूरियों को लूचि कहते हैं  इस दिन नए कपड़े पहनने का रिवाज़ है और छोटे बच्चे नए कपड़े पहने हर जगह चहकते दिखाई देते हैं।
दुर्गा पूजा के ये चार दिन। हर जगह खुशी और उल्लास। लोग हर रोज़ सुबह उपवास रख माँ दुर्गा के चरणों में पुष्पांजलि अर्पित करने दुर्गा पंडाल जाते हैं और अपनी मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं।


 सुबह-सुबह ही दुर्गा पंडाल में महिलाओं को लाल पाड़ की साड़ी पहने पूजा के काम में व्यस्त देखा जा सकता है। कोई महाभोग की तैयारी करती दिखाई देती हैं तो कोई फूल की माला गूँथती। लोगों की भीड़ और धूप बाती की आध्यात्मिक गंध के साथ ढाक (ढोल) की आवाज़ पूरे वातावरण को पवित्र कर देती हैं।यहाँ ढाक बजाने के लिए भी कलाकार बंगाल से ही आते हैं  माँ दुर्गा की आरती होती है और उसके बाद उन्हें भोग लगाया जाता है। दोपहर को सभी उपस्थित जनों को खिचड़ी और तरकारी का प्रसाद खिलाया जाता है। दुर्गा पूजा के इन दिनों में स्थानीय कलाकारों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का पूरा अवसर मिलता है और हर शाम सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं।आपको जानकर हैरानी होगी कि मशहूर सिंगर पलाश सेन भी अपने नए दिनों में पंडाल के सांस्कृतिक कार्यक्रम में गाते थे।


महाअष्टमी या नवरात्रि के आठवें दिन का अपना महत्व है।  संधिपूजा अष्टमी के दिन होती है। संधिपूजा का एक निश्चित मुहूर्त होता है और उस मुहूर्त में बलि चढ़ाई जाती है। पुराने ज़माने में लोग बकरे की बलि चढ़ाते थे मगर ये प्रथा अब ना के बराबर रह गई है। ज़्यादातर जगहों पर किसी फल जैसे कुम्हड़े आदि की बलि चढ़ाई जाती है। मंत्रोच्चारण के साथ 108 जलते दीयों के बीच उस संधिक्षण की बलि के लिए लोग निर्जल उपवास रखते हैं और उन कुछ क्षणों के लिए सारा जग जैसे शांत हो जाता है। कहते हैं उस संधिक्षण में माँ के प्राण आते हैं। पूजा के नवें दिन या महानवमी को आरती भोग आदि के साथ-साथ शाम को पंडाल में तरह-तरह के कार्यक्रमों और प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। नवमी के दिन सुबह एक छोटी लड़की को साड़ी पहना कर सजाकर उसकी पूजा की जाती है जिसे 'कुमारी पूजा' कहते हैं। उस कुमारी पूजा को देख कर वहाँ उपस्थित हर दूसरी छोटी लड़की 'कुमारी' के भाग्य से ईर्ष्या करती है।


शाम को होने वाली आरती से पहले महिलाऐं शंख बजती हैं। आरती के बाद 'धूनुचि नाच' प्रतियोगिता में लड़के हिस्सा लेते हैं। 'धूनुचि' मिट्टी के बड़े सुराहीनुमा प्रदीप होते हैं जिनमें नारियल के छिलकों को जलाया जाता है और 'धूनो' नामक सुगंधित पदार्थ डाल कर उन प्रदीपों को हाथ में ले कर लड़के अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते हैं। 


एक साथ 2-2 धूनुचि ले कर और उसमें से गिरती आग के बीच नाचते ये जोशीले लड़के जैसे माँ दुर्गा को खुश करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। बीच-बीच में उस गिरती आग को आसपास खड़े लोग ज़मीन पर से हटा देते हैं ताकि नाचने वाले का पाँव न पड़ जाए उन चिंगारियों पर।


अगले  दिन दशमी को सुबह माँ दुर्गा की पूजा के साथ ही उन्हें मंत्रोच्चारण के साथ विसर्जित कर दिया जाता है मगर प्रतिमाओं का विसर्जन होता है शाम को जब हर प्रतिमा के साथ एक बड़ी भीड़ होती है। प्रतिमा के विसर्जन से पहले, विवाहित महिलाएँ माँ दुर्गा की प्रतिमा को सिंदूर लगाने पंडाल आती हैं और वहाँ होली की ही तरह सुहागिनें सिंदूर से खेलती हैं। माहौल कुछ ऐसा बन जाता है जैसे लाड़ली बेटी दुर्गा मायके से ससुराल जा रही हो और सभी उसे विदा करने आए हों।


यह पर्व प्रतीक है बुराई पर अच्छाई की विजय का, सत्य की जीत का.पंडाल में लगने वाली हर मूर्ति किसी विशेष सन्देश की वाहक होती है
महिषासुर यदि अन्याय, अत्याचार औऱ पापाचार का प्रतीक है तो दुर्गा शक्ति, न्याय और हर अन्याय के विरुद्ध प्रतिकार की प्रतीक है। उसकी आँखों में सिर्फ़ करुणा और दया के आँसू ही नहीं बहते, बल्कि क्रोध के स्फुलिंग भी छिटकते हैं। सब हमारे जीवन में सामाजिक न्याय की प्रतीक हैं।
विजयादशमी के दिन छोटे पैर छू कर अपने बड़ों से आशीर्वाद लेते हैं और मुँह मीठा करते हैं। लोग एक दूसरे से मिलने सबके घर जाते हैं और मिठाई व उपहार देते हैं और ये प्रक्रिया कई दिनों तक चलती रहती हैं। इस तरह संपूर्ण होती है दुर्गा पूजा.

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आपकी हमसफ़र आपकी दोस्त 

डा० कायनात क़ाज़ी