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प्रिय पाठक,
हिन्दी के प्रथम ट्रेवल फ़ोटोग्राफ़ी ब्लॉग पर आपका स्वागत है.….
ऐसा नहीं है कि हिन्दी में अच्छे ब्लॉग लिखने वालों की कमी है। हिन्दी में लोग एक से एक बेहतरीन ब्लॉग्स लिख रहे हैं। पर एक चीज़ की कमी अक्सर खलती है। जहां ब्लॉग पर अच्छा कन्टेन्ट है वहां एक अच्छी क्वालिटी की तस्वीर नहीं मिलती और जिन ब्लॉग्स पर अच्छी तस्वीरें होती हैं वहां कन्टेन्ट उतना अच्छा नहीं होता। मैं साहित्यकार के अलावा एक ट्रेवल राइटर और फोटोग्राफर हूँ। मैंने अपने इस ब्लॉग के ज़रिये इस दूरी को पाटने का प्रयास किया है। मेरा यह ब्लॉग हिन्दी का प्रथम ट्रेवल फ़ोटोग्राफ़ी ब्लॉग है। जहाँ आपको मिलेगी भारत के कुछ अनछुए पहलुओं, अनदेखे स्थानों की सविस्तार जानकारी और उन स्थानों से जुड़ी कुछ बेहतरीन तस्वीरें।
उम्मीद है, आप को मेरा यह प्रयास पसंद आएगा। आपकी प्रतिक्रियाओं की मुझे प्रतीक्षा रहेगी।
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डा० कायनात क़ाज़ी

Tuesday, 7 April 2015

बौद्ध धर्म की उदय स्थली -सारनाथ



उत्तर प्रदेश की धार्मिक तथा सांस्कृतिक नगरी वाराणसी से 12 किलोमीटर  दूर अति प्राचीन नगर और बौद्धों का तीर्थ सारनाथ स्थित है।  इसका निर्माण 500 ईस्वी में सम्राट अशोक द्वारा 249 ईसा पूर्व बनाए गए एक स्तूप अन्य कई स्मारक के स्थान पर किया गया था। ज्ञान प्राप्त करने के बाद यहीं पर भगवान बुद्ध ने अपने पांच शिष्यों को पहला उपदेश दिया था। यहाँ से ही उन्होंने "धर्म चक्र प्रवर्तन" प्रारम्भ किया। यह जैन धर्म अनुयायों का भी धार्मिक स्थल माना जाता है।



सारनाथ में अशोक का चतुर्मुख सिंहस्तम्भ, भगवान बुद्ध का मन्दिर, धमेख स्तूप, चौखन्डी स्तूप, राजकीय संग्राहलय, जैन मन्दिर, चीनी मन्दिर, थाई मंदिर, जापानी मंदिर, कम्बोडिया मंदिर, कोरियामंदिर, म्यामार मंदिर, मूलंगधकुटी विहार और अन्य कई नवीन विहार इत्यादि दर्शनीय हैं। सम्राट अशोक के समय में यहाँ बहुत से निर्माण-कार्य हुए। शेरों की मूर्ति वाला भारत का राजचिह्न सारनाथ के अशोक के स्तंभ के शीर्ष से ही लिया गया है। यहाँ का 'धमेक स्तूप' सारनाथ की प्राचीनता का आज भी बोध कराता है। 

सारनाथ काशी से सटा हुआ एक प्राचीन नगर है पर यहाँ शहर का कोलाहल और शोर नहीं है। यहाँ पर चौखुड़ी स्तूप है जोकि गुप्त वंश काल में  बनाया गया था। यहाँ  स्तूपा है जिसका  नाम है -धर्म अराजिक स्तूपा ऐसा कहा जाता है कि इस स्तूप में भगवान  बुद्ध  की अस्थियां राखी गई थीं।


इसी के नज़दीक खुदाई में एक विशाल बोध विहार (मोनेस्ट्री ) के अवशेष मिले हैं। यहाँ लगभग 2000 बोध भिक्षु रहा करते थे। आज केवल इसके भग्नावशेष ही रह गए हैं। इसका शीर्ष पुरातत्व विभाग के संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है.




यह संग्रहालय स्तूपा के नज़दीक ही है। और यहाँ खुदाई में निकली वस्तुओं का एक बड़ा संग्रह मौजूद है।  इसमें ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी से 12वीं शताब्दी के बीच के बुद्ध कला के बेहतरीन नमूने शामिल हैं। भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण ने यहां 1930 से खुदाई का काम शुरू किया और कई स्मारक, ढांचा और प्रचीन कला कृतियों को निकाला। इसे पुरातात्विक खुदाई क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। यहां पाई गई कला कृतियों को म्यूजियम में प्रदर्शनी के लिए रखा गया है। सारनाथ के क्षेत्र की ख़ुदाई से गुप्तकालीन अनेक कलाकृतियां तथा बुद्ध प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं जो वर्तमान संग्रहालय में सुरक्षित हैं।



संग्रहालय (म्यूजियम) में कुल पांच गैलरी और दो बरामदे हैं। गुप्तकाल में सारनाथ की मूर्तिकला की एक अलग ही शैली प्रचलित थी, जो बुद्ध की मूर्तियों के आत्मिक सौंदर्य तथा शारीरिक सौष्ठव की सम्मिश्रित भावयोजना के लिए भारतीय मूर्तिकला के इतिहास में प्रसिद्ध है। सारनाथ से कई महत्त्वपूर्ण अभिलेख भी मिले हैं जिनमें काशी के राजा श्री प्रकटादित्य का शिलालेख  प्रमुख है। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी सारनाथ की यात्रा की थी, और उसने यहाँ के मंदिर की भव्यता के विषय में लिखा है। इसमें बालादित्य नरेश का उल्लेख है जो फ्लीट के मत में वही बालादित्य है जो मिहिरकुल हूण के साथ वीरतापूर्वक लड़ा था। यह अभिलेख शायद 7वीं शती के पूर्व का है। दूसरे अभिलेख में हरिगुप्त नामक एक साधु द्वारा मूर्तिदान का उल्लेख है। यह अभिलेख 8वीं शती ई॰ का जान पड़ता है।


धम्मेक स्तूप :

 भगवान बुद्ध ने अपने धम्म का प्रथम ऐतिहासिक उपदेश पंचवर्गीय भिक्षुओं को जिस स्थान से दिया था वह धम्मेक या धमेक आदि नामों से जाना जाता है। यहीं से बुद्ध नेबहुजन हिताय, बहुजन सुखाय और लोकानुकम्पायका आदेश पंचवर्गीय भिक्षुओं को दिया था। सम्राट अशोक ने इसे अति विशेष ईंटों एवं पत्थरों द्वारा 30 मीटर घेरे में गोलाकार और 46 मीटर ऊंचे एक स्तूप के रूप में बनवाया था। अशोक यहां अपने राज्यारोहण के 20 वर्ष बाद अपने गुरू मोंगलिपुत्र तिस्य के साथ आये थे। स्थिर पाल-वसन्तपाल के शिलालेख के अनुसार धम्मेक का पुराना नाम धर्मचक्र स्तूप था। प्रथम उपदेश देने के वजह से बौद्धअनुयायी इसे साक्षात बुद्ध मान कर इसकी पूजा वन्दना और परिक्रमा आदि करते हैं।


आधुनिक मूलगंध कुटी विहार:

यहीं थोड़ा आगे मूलगंध कुटी विहार मंदिर है जिसे 1931 में श्रीलंकन महाबोधि सोसाइटी ने बनाया है। मंदिर की भीतरी दीवारों पर  आकर्षक भित्तिचित्र भी देखें जा सकते हैं। इसे जापान के एक प्रसिद्ध पेंटर कोसेत्सु नोसु ने बनाया था। विहार के प्रवेश द्वार पर तांबे की एक बड़ी सी घंटी लगी हुई है, जिसे जापान के एक साही परिवार ने उपहार में दिया था। यहां गौतम बुद्ध की सोने की एक  प्रतिमा भी रखी हुई है।


इस मंदिर के अहाते में दाईं ओर बौद्ध वृक्ष लगाया गया है। इसी वृक्ष के नीचे बैठ कर भगवान बुद्ध ने अपने पांच शिष्यों को दीक्षा दी थी। इस स्थान को पवित्र स्थान का दर्ज प्राप्त है। लोग देश विदेश से आकर यहाँ पूजा अर्चना करते हैं।





यहां रखी बुद्ध की अस्थियों को हर वर्ष कार्तिक माह की पूर्णिमा वाले दिन श्रद्धालुओं के पूजन के लिए बाहर रखा जाता है और सम्पूर्ण सारनाथ में जुलूस के साथ परिक्रमा करके उसको दुबारा उसी स्थान पर रखा जाता है। 

 
अशोक सिंह शीर्ष (राजचिन्ह):

अशोक स्तंभ उत्तर भारत में मिलने वाले श्रृंखलाबद्ध स्तंभ हैं। इन स्तंभों को सम्राट अशोक ने अपने शासनकाल में तीसरी शताब्दी में बनवाया था। हर स्तंभ की ऊंचाई 40 से 50 फीट है और वजन कम से कम 50 टन है। इन स्तंभों को वाराणसी के पास स्थित एक कस्बे चुनार में बनाया गया था और फिर इसे खींचकर उस जगह लाया गया, जहां उसे खड़ा किया गया था। वैसे तो कई अशोक स्तंभ का निर्माण किया गया था, पर आज शिलालेख के साथ सिर्फ 19 ही शेष बचे हैं। इनमें से सारनाथ का अशोक स्तंभ सबसे प्रसिद्ध है।

अशोक स्तम्भ के ऊपरी सिरे पर पीठ से सटाकर उकडूं मुद्रा में बैठे हुए चार सिंह चारों दिशाओं की तरफ मुँह किए स्थापित हैं। इस चारों सिंहों के उपर भगवान बुद्ध का 32 तीलियों वाला धम्म चक्र विद्यमान था। जो आज उसके ऊपर स्थापित नहीं है। वह सारनाथ संग्रहालय में प्रवेश करने के स्थान पर ही एक हॉल में सुरक्षित रखा गया है। इसकी उत्कृष्ट कलाकारी इसे अद्वितीय प्रतिमाओं में शामिल करती है शायद इसी लिए भारत सरकार ने इसे अपना राजचिन्ह घोषित किया है। यह सिंह शीर्ष चार भागों में बंटा है।
1. पलटी हुई कमल की पंखुडियों से ढका हुआ कुम्भिका भाग
2. गोलाकार भाग जिसमें चार धर्मचक्र चार पशु क्रमशः हाथी, वृषभ (सांड), अश्व सिंह बने हुए हैं।
3. चारों सिंह एक दूसरे के विपरीत पीठ सटाकर चारों दिशाओं की ओर मुंह कर उकइं मुद्रा में बैठे हैं।
4. इन चारों के ऊपर धर्मचक्र स्थापित था जो अब नहीं है। यह प्रतिमा भूरे रंग की बलुआ की बनी है। यह चार शेर शक्ति, शौर्य, गर्व और आत्वविश्वास के सूचक हैं। स्तंभ के ही निचले भाग में बना अशोक चक्र आज राष्ट्रीय ध्वज की शान बढ़ा रहा है।

आप सारनाथ जाएं तो सोविनियर के तौर पर मिनिएचर अशोक स्तम्भ लाना भूलें। यह स्तम्भ हमारे राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है। आपकी डेस्क पर खूब जंचेगा।



यहीं  सारनाथ में एक  थाई बौद्ध विहार परिसर है। जहाँ पर भगवान बुद्ध की सबसे ऊंची प्रतिमा स्थापित की गई है भगवान बुद्ध की प्रतिमा की उंचाई 80 फुट है तथा यह देश की सबसे ऊंची प्रतिमा मानी  जाती है   बुद्ध प्रतिमा गंधार शैली में बनी  है। 



 बौद्ध विहार के संस्थापक भंते रश्मि के अनुसार इस प्रतिमा को बनाने में चुनार के पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। पत्थर के 847 टुकडों को तराशकर प्रतिमा का निर्माण किया गया  है प्रतिमा पूरी तरह ठोस है। इसका कोई हिस्सा खोखला नहीं है इसे स्थापित करने के लिए 20 फुट ऊंचा फाउन्डेशन बनाया गया है।




काग्यु तिब्बती मठ:

यहां तिब्बत, चीन, जापान और थाईलैंड जैसे देशों से ढेरों तीर्थ यात्री और बौद्ध विद्वान आते हैं। इन देश के लोगों ने यहां अपने मंदिर बना लिए हैं और गांव में सीखने के लिए कई केन्द्रों की स्थापना भी की है। इन्हीं में से एक है काग्यु तिब्बती मठ। इसे वज्र विद्या संस्थान के नाम से भी जाना जाता है और इसकी स्थापना थरांगू रिनपोचे ने की थी। काग्यु तिब्बती मठ सारनाथ में सबसे बड़ा मठ है और इसे बोध गया के पास स्थित नालंदा मनैस्टिक इंस्टीट्यूट की शैली में बनाया गया है। 


इन मॉनेस्ट्री में थोड़ी देर बैठ कर आप सुकून से मेडिटेशन भी कर सकते हैं। यहाँ के लोग आत्मीय और मित्रता पूर्वक हैं। मोनेस्ट्री में खेलते छोटे-छोटे बौद्ध लामा आपको बरबस ही अपनी ओर आकर्षित कर लेंगे।




सारनाथ देखने के लिए पूरा एक दिन निकालिये, और कोशिश कीजिये कि दिन की शुरुआत सुबह जल्दी करें। सोवेनियर के तौर पर महात्मा बुद्ध की ध्यानमग्न मूर्ति और अन्य सामान लेजाना भूलें।




फिर मिलेंगे दोस्तों, भारत दर्शन में किसी नए शहर की यात्रा पर,
तब तक खुश रहिये, और घूमते रहिये,

आपकी हमसफ़र आपकी दोस्त



डा० कायनात क़ाज़ी

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